संवेदना का अमर स्वर : महाकवि डॉ. कुंअर बेचैन की काव्य-यात्रा और जीवन-दर्शन
जन्मदिवस विशेष | 1 जुलाई ‘हो के मायूस न यूँ शाम से ढलते रहिए,ज़िंदगी भोर है, सूरज से निकलते रहिए।’ इन दो पंक्तियों में महाकवि डॉ. कुंअर बेचैन का संपूर्ण जीवन-दर्शन समाहित है। निराशा के अंधकार में आशा का दीप जलाना, टूटते हुए मनुष्य को जीने का साहस देना और संवेदनाओं को शब्दों की गरिमा …
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