
कवि सम्मेलन भारतीय साहित्यिक परंपरा का एक अत्यंत लोकप्रिय और प्रभावशाली मंच रहा है। यह केवल कविता सुनने-सुनाने का आयोजन नहीं, बल्कि भाषा, साहित्य, संस्कार, संवेदना और सामाजिक चेतना का जीवंत उत्सव हुआ करता था। कवि सम्मेलन में कवि अपनी रचना लेकर आता था, लेकिन साथ ही वह दूसरे कवियों को सुनने, उनसे सीखने और अच्छी कविता पर दाद देने का संस्कार भी लेकर आता था। लेकिन आज यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या हमारे कवि सम्मेलन अपनी मूल आत्मा से दूर होते जा रहे हैं? क्या साहित्य का मंच धीरे-धीरे ऐसा स्थान बनता जा रहा है जहाँ कवि आते हैं, अपनी कविता सुनाते हैं, तस्वीर खिंचवाते हैं और फिर बिना किसी दूसरे कवि को सुने चले जाते हैं? कहीं-कहीं तो स्थिति इतनी विचित्र दिखाई देती है कि कवि सम्मेलन में शामिल कवि ही एक-दूसरे को सुनने के लिए उपलब्ध नहीं होते। प्रत्येक को अपनी बारी का इंतजार रहता है। अपनी बारी आई, कविता सुनाई, तालियाँ बटोरीं और फिर प्रस्थान। मानो साहित्यिक आयोजन नहीं, कोई ऐसी यात्रा हो जिसमें प्रत्येक व्यक्ति केवल अपने गंतव्य तक पहुँचने के लिए आया हो। इसीलिए कभी-कभी मन में सवाल उठता है कि क्या मंच अब पिकनिक स्पॉट बनने लगे हैं?
मंच कविता से बड़ा नहीं

कवि सम्मेलन का सबसे पहला अनुशासन यह होना चाहिए कि मंच कविता से बड़ा नहीं है और कवि मंच से बड़ा नहीं है। मंच साहित्य का है। वहाँ आने वाला प्रत्येक कवि साहित्य का प्रतिनिधि बनकर आता है। इसलिए उसका दायित्व केवल अपनी कविता सुनाकर समाप्त नहीं हो जाता। वह जिस मंच पर बैठा है, वहाँ किसी अन्य कवि की रचना भी साहित्य ही है। उसे सुनना, समझना और सम्मान देना भी उसकी जिम्मेदारी है। पहले के कवि सम्मेलनों की एक बड़ी खूबसूरती यही थी कि कवि स्वयं अच्छे श्रोता भी होते थे। वरिष्ठ कवि कनिष्ठ को सुनते थे। एक विधा का कवि दूसरी विधा के कवि को सुनता था। हास्य कवि गंभीर कविता का आनंद लेता था और गीतकार मुक्तक पर दाद देता था। किसी की पंक्ति अच्छी लगी तो तालियाँ बजती थीं, चाहे वह पंक्ति किसी बड़े नाम की हो या किसी नए रचनाकार की। कविता के प्रति सम्मान, कवि के प्रति सम्मान से भी बड़ा था।
पहले मंच सीखने की जगह थे
कवि सम्मेलन वास्तव में साहित्य की पाठशाला हुआ करते थे। नया कवि मंच पर आता था तो उसके लिए केवल तालियाँ महत्वपूर्ण नहीं होती थीं। वह देखता था कि वरिष्ठ कवि श्रोताओं से कैसे संवाद कर रहा है, कविता का चयन कैसे कर रहा है, प्रस्तुति में ठहराव कहाँ है, शब्दों का उच्चारण कैसा है और मंच की गरिमा कैसे बनाए रखी जाती है। कई बार किसी वरिष्ठ कवि की दो पंक्तियाँ भी नए कवि के लिए पूरी पाठशाला बन जाती थीं। आज भी वरिष्ठ रचनाकारों से सीखने की उतनी ही आवश्यकता है, लेकिन इसके लिए पहले सुनने का धैर्य चाहिए। जो व्यक्ति केवल स्वयं बोलना चाहता है, वह सीख नहीं सकता।
अपनी सुनाओ और भाग जाओ
आज अनेक आयोजनों में एक प्रवृत्ति दिखाई देती है-“अपनी सुनाओ और भाग जाओ।” कवि कार्यक्रम में पहुँचा। मंच पर गया। संचालक ने परिचय दिया। कवि ने अपनी दो-चार रचनाएँ सुनाईं। फोटो खिंची। वीडियो बना। सोशल मीडिया के लिए सामग्री तैयार हुई और कवि अगले कार्यक्रम के लिए निकल गया। दूसरी ओर मंच पर बैठा अगला कवि भी शायद यही सोच रहा है कि कब उसकी बारी आए और कब वह अपनी प्रस्तुति देकर चला जाए। यदि सभी यही करने लगें तो कवि सम्मेलन में सामूहिक साहित्यिक अनुभव कहाँ बचेगा? कवि सम्मेलन का अर्थ केवल “मेरा पाठ” नहीं, बल्कि “हमारा साहित्य” होना चाहिए।
मंच का अनुशासन क्यों आवश्यक है?
कवि सम्मेलन में मंचीय अनुशासन अत्यंत आवश्यक है। सबसे पहले समय का सम्मान होना चाहिए। प्रत्येक कवि को निर्धारित समय दिया जाए और संचालक निष्पक्षता से उसका पालन कराए। किसी बड़े नाम के कारण समय की सीमा समाप्त हो जाए और नए कवि को जल्दी-जल्दी कविता पढ़नी पड़े, यह उचित नहीं। दूसरा है क्रम का सम्मान। कार्यक्रम का क्रम आयोजक और संचालक तय करते हैं। बार-बार अपनी सुविधा के अनुसार क्रम बदलवाना मंचीय अनुशासन के अनुकूल नहीं। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण है दूसरे कवि को सुनना। जब कोई कवि कविता पढ़ रहा हो तो बाकी कवियों का बातचीत करना, मोबाइल में व्यस्त रहना, मंच के पीछे आना-जाना या आपस में चर्चा करना उसकी रचना और श्रोताओं दोनों का अपमान है। चौथा है संचालक का सम्मान। संचालक केवल नाम पुकारने वाला व्यक्ति नहीं होता। वह पूरे कार्यक्रम की गति, गरिमा और संतुलन का जिम्मेदार होता है। उसे भी निष्पक्ष और संयमित रहना चाहिए।
हास्य हो, लेकिन मर्यादा के साथ
कवि सम्मेलन में हास्य और व्यंग्य की अपनी विशेष जगह है। हास्य कविता वातावरण को हल्का करती है और श्रोताओं को जोड़ती है। लेकिन हास्य के नाम पर व्यक्तिगत टिप्पणी, अश्लीलता, किसी की निजी जिंदगी पर कटाक्ष या किसी कवि का सार्वजनिक उपहास मंच की गरिमा को कम करता है। हँसाना कला है, लेकिन किसी को अपमानित किए बिना हँसाना उससे बड़ी कला है। इसी प्रकार राजनीतिक या सामाजिक विषयों पर कविता कही जा सकती है, व्यंग्य किया जा सकता है, लेकिन व्यक्तिगत द्वेष को साहित्य का नाम देना उचित नहीं।
तालियों की भूख या कविता की साधना?
आज सोशल मीडिया ने कवि सम्मेलन को एक नया आयाम दिया है। कविता के साथ वीडियो, रील, फोटो और लाइव प्रसारण भी महत्वपूर्ण हो गए हैं। यह तकनीक बुरी नहीं है। इससे कविता दूर-दूर तक पहुँच सकती है। समस्या तब पैदा होती है जब कविता माध्यम न रहकर केवल कंटेंट बन जाती है। कवि की चिंता कविता से अधिक यह हो जाए कि किस पंक्ति पर कितनी तालियाँ मिलीं, कितने वीडियो बने और कितने लोगों ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया दी, तो साहित्य की साधना पीछे छूटने लगती है। कवि को तालियाँ मिलें, यह अच्छी बात है। लेकिन तालियों से बड़ी उपलब्धि यह है कि श्रोता कविता की कोई पंक्ति अपने मन में लेकर घर जाए।
कवि सम्मेलन पिकनिक स्पॉट नहीं
कवि सम्मेलन में आना, कविता सुनाना और चले जाना आसान है। लेकिन कविता सुनना, दूसरे की सफलता पर प्रसन्न होना, अच्छी पंक्ति पर खुलकर दाद देना और अपनी बारी का इंतजार करना-यही वास्तविक मंचीय संस्कार है। मंच कोई पिकनिक स्पॉट नहीं है। मंच साहित्य की पाठशाला है। यहाँ आने वाला हर व्यक्ति विद्यार्थी भी है और शिक्षक भी। कोई अपनी कविता से सिखाता है, कोई अपनी प्रस्तुति से, कोई अपने व्यवहार से और कोई अपनी विनम्रता से। हमें यह भी याद रखना चाहिए कि कवि सम्मेलन की सफलता केवल मंच पर बैठे कवियों से तय नहीं होती, बल्कि इस बात से तय होती है कि कार्यक्रम समाप्त होने के बाद श्रोता साहित्य के कितने करीब पहुँचे।
आखिर हम कैसा मंच चाहते हैं?
हमें ऐसा मंच चाहिए जहाँ वरिष्ठता का सम्मान हो, लेकिन नए कवि के लिए दरवाजा खुला रहे। ऐसा मंच चाहिए जहाँ हास्य हो, लेकिन मर्यादा भी हो। ऐसा मंच चाहिए जहाँ तालियाँ हों, लेकिन साहित्य तालियों का गुलाम न हो। ऐसा मंच चाहिए जहाँ कवि अपनी कविता सुनाए, लेकिन दूसरे की कविता सुनने का संस्कार भी रखे। ऐसा मंच चाहिए जहाँ फोटो खिंचें, वीडियो बनें, सोशल मीडिया पर प्रसारण हो लेकिन इन सबके बीच कविता कहीं खो न जाए। और सबसे महत्वपूर्ण, ऐसा मंच चाहिए जहाँ कवि यह न सोचे कि “मेरी बारी कब आएगी?”, बल्कि यह भी सोचे कि “अभी कौन-सी अच्छी कविता सुनने को मिल रही है?” क्योंकि सच्चा कवि केवल अच्छा वक्ता नहीं होता, वह अच्छा श्रोता भी होता है। मंच पर आने की जल्दी से अधिक, मंच के योग्य बनने की तैयारी होनी चाहिए। और शायद आज के कवि सम्मेलनों के लिए इससे बड़ी सीख और कोई नहीं। अपनी सुनाना ही कवि का धर्म नहीं, अच्छी कविता को सुनना भी साहित्य का सम्मान है। यदि हम यह संस्कार बचा पाए, तो कवि सम्मेलन केवल कार्यक्रम नहीं रहेंगे, वे फिर से साहित्य की जीवंत पाठशालाएँ बन सकेंगे।
-डॉ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

