
लेखक : डॉ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)
देश में सार्वजनिक परीक्षाओं में पेपरलीक की लगातार बढ़ती घटनाओं ने करोड़ों युवाओं के भविष्य को संकट में डाल दिया है। ऐसे समय में राजस्थान सरकार द्वारा पेपरलीक माफिया के खिलाफ आजीवन कारावास और ₹10 करोड़ तक के जुर्माने का प्रावधान करने वाला कठोर कानून लागू करने का निर्णय निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण और स्वागतयोग्य कदम है। केंद्र सरकार भी सार्वजनिक परीक्षाओं की सुरक्षा को और मजबूत बनाने की दिशा में प्रयासरत है। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या केवल कानून सख़्त कर देने से पेपरलीक रुक जाएगा? पिछले वर्षों का अनुभव बताता है कि कानून की कठोरता तभी प्रभावी होती है, जब उसका निष्पक्ष, त्वरित और दृढ़ता से पालन कराया जाए।
प्रतियोगी परीक्षाएँ केवल नौकरी प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि करोड़ों युवाओं के सपनों, संघर्ष और भविष्य की आधारशिला हैं। एक पेपरलीक लाखों अभ्यर्थियों की वर्षों की मेहनत पर पानी फेर देता है। परीक्षाएँ निरस्त होती हैं, नियुक्तियाँ टलती हैं, आयु सीमा प्रभावित होती है और व्यवस्था के प्रति विश्वास कमजोर पड़ जाता है।
पिछले एक दशक में राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, गुजरात, उत्तराखंड और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में कई चर्चित पेपरलीक मामलों ने पूरे देश को झकझोर दिया। राजस्थान में रीट, शिक्षक भर्ती, पटवारी और उपनिरीक्षक भर्ती परीक्षाएँ, उत्तर प्रदेश में 2024 की पुलिस भर्ती परीक्षा, बिहार में नीट और बीपीएससी से जुड़े मामले तथा मध्य प्रदेश का व्यापम घोटाला इस समस्या की गंभीरता को उजागर करते हैं। स्पष्ट है कि पेपरलीक अब एक संगठित अपराध बन चुका है, जिसकी जड़ें कई राज्यों तक फैली हैं।
विडंबना यह है कि अनेक राज्यों में कठोर कानून बनने और बड़ी संख्या में गिरफ्तारियाँ होने के बावजूद दोषसिद्धि के मामले बहुत कम दिखाई देते हैं। इसकी प्रमुख वजह लंबी विवेचना, वर्षों तक चलने वाली न्यायिक प्रक्रिया, तकनीकी साक्ष्यों की कमी, राज्यों के बीच समन्वय का अभाव तथा प्रभावशाली लोगों के संरक्षण की आशंकाएँ हैं। जब अपराधी को यह भरोसा हो जाए कि मुकदमा वर्षों तक चलेगा, तब कानून का डर स्वतः समाप्त हो जाता है।
राष्ट्रीय परीक्षा सुधार समिति के अध्यक्ष और इसरो के पूर्व अध्यक्ष डॉ. के. राधाकृष्णन भी परीक्षा प्रणाली को तकनीक आधारित, पारदर्शी और जवाबदेह बनाने पर जोर दे चुके हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने भी स्पष्ट कहा है कि परीक्षा प्रणाली की पवित्रता और विश्वसनीयता सर्वोपरि है। यदि अभ्यर्थियों का विश्वास उठ गया तो इसका दुष्प्रभाव पूरे समाज पर पड़ेगा।
पेपरलीक रोकने के लिए केवल कठोर दंड नहीं, बल्कि व्यापक संस्थागत सुधार आवश्यक हैं। प्रश्नपत्रों की बहुस्तरीय डिजिटल सुरक्षा, परीक्षा केंद्रों की आधुनिक निगरानी, प्रत्येक मामले की तीन माह में विवेचना, एक वर्ष के भीतर न्यायिक निर्णय, दोषियों की संपत्ति की कुर्की, परीक्षा कराने वाली संस्थाओं की जवाबदेही, अंतरराज्यीय गिरोहों के खिलाफ संयुक्त अभियान तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी व्यवस्था जैसे कदम समय की मांग हैं।
सबसे महत्वपूर्ण है राजनीतिक इच्छाशक्ति। पेपरलीक के पीछे करोड़ों रुपये का अवैध कारोबार सक्रिय रहता है। जब तक इस आर्थिक नेटवर्क को ध्वस्त नहीं किया जाएगा और किसी भी प्रभावशाली व्यक्ति को संरक्षण नहीं मिलेगा, तब तक समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं होगा।
देश का युवा केवल रोजगार नहीं, बल्कि निष्पक्ष अवसर चाहता है। वह चाहता है कि उसकी सफलता उसकी प्रतिभा और परिश्रम से तय हो, न कि किसी दलाल, गिरोह या भ्रष्ट तंत्र की साज़िश से। राजस्थान का नया कानून पूरे देश के लिए एक मजबूत संदेश है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि दोषियों को कितनी जल्दी और निष्पक्ष रूप से दंड मिलता है।
पेपरलीक केवल प्रश्नपत्र की चोरी नहीं, बल्कि करोड़ों युवाओं के सपनों, उनके परिश्रम और राष्ट्र के भविष्य की चोरी है। इसलिए अब समय केवल सख़्त कानून बनाने का नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था स्थापित करने का है जिसमें अपराधी के बच निकलने की कोई संभावना न हो। देश को अब सख़्त कानून के साथ सख़्त कार्रवाई भी चाहिए—यही युवाओं के विश्वास, शिक्षा व्यवस्था की गरिमा और राष्ट्र के भविष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

