
आईवीएफ केवल एक उपचार नहीं, बल्कि संतान प्राप्ति का इंतजार कर रहे परिवारों के लिए आशा की किरण है : डॉ. अर्चना शर्मा
यूपी – गाजियाबाद, 24 जुलाई। बदलती जीवनशैली, बढ़ते तनाव और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के कारण बांझपन के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। ऐसे में आधुनिक चिकित्सा तकनीक इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) लाखों दंपतियों के लिए नई उम्मीद बनकर सामने आई है। 25 जुलाई को विश्व आईवीएफ दिवस के अवसर पर गणेश अस्पताल की चेयरपर्सन डॉ. अर्चना शर्मा ने समय पर जांच कराने और भ्रांतियों से दूर रहने की अपील की।
डॉ. अर्चना शर्मा ने बताया कि आईवीएफ केवल एक उपचार नहीं, बल्कि उन परिवारों के लिए आशा की किरण है जो लंबे समय से संतान प्राप्ति का इंतजार कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि कोई दंपति एक वर्ष तक नियमित प्रयास के बावजूद गर्भधारण नहीं कर पाता है, तो स्त्री और पुरुष दोनों की जांच करानी चाहिए। वहीं, यदि महिला की आयु 35 वर्ष से अधिक है तो छह महीने तक गर्भधारण न होने पर ही विशेषज्ञ से परामर्श लेना उचित है। समय पर जांच और सही उपचार से सफलता की संभावना काफी बढ़ जाती है।
उन्होंने बताया कि आईवीएफ में महिला के अंडाणु और पुरुष के शुक्राणु को प्रयोगशाला में निषेचित कर भ्रूण तैयार किया जाता है, जिसे बाद में गर्भाशय में प्रत्यारोपित किया जाता है। यह तकनीक बंद या क्षतिग्रस्त फैलोपियन ट्यूब, पुरुषों में शुक्राणुओं की कमी, एंडोमेट्रियोसिस, बढ़ती उम्र, बार-बार गर्भपात या लंबे समय तक गर्भधारण न होने जैसी स्थितियों में प्रभावी साबित होती है।
डॉ. अर्चना शर्मा ने कहा कि आईवीएफ को लेकर समाज में फैली भ्रांतियों से बचना चाहिए। संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, धूम्रपान और शराब से दूरी तथा तनाव पर नियंत्रण प्रजनन क्षमता को बेहतर बनाते हैं। उन्होंने दंपतियों से अपील की कि झाड़-फूंक जैसे अवैज्ञानिक उपायों में समय गंवाने के बजाय योग्य विशेषज्ञ से सलाह लें। विश्व आईवीएफ दिवस का उद्देश्य बांझपन के प्रति जागरूकता बढ़ाना और आधुनिक चिकित्सा के माध्यम से अधिक से अधिक दंपतियों को मातृत्व एवं पितृत्व का सुख दिलाने के लिए प्रेरित करना है।

