सिटीजन चार्टर: क्या गाजियाबाद में समय पर मिल रही हैं सरकारी सेवाएं?

यूपी – गाजियाबाद। यदि आपकी गली का सीवर जाम हो जाए, स्ट्रीट लाइट खराब हो जाए या कई दिनों तक कूड़ा न उठे, तो क्या आपको पता है कि नगर निगम को इसे कितने दिनों में ठीक करना चाहिए? अधिकांश नागरिक इसका उत्तर नहीं जानते। जबकि इसके लिए बाकायदा ‘सिटीजन चार्टर’ बनाया गया है, जिसमें हर सेवा की समय-सीमा तय है। सवाल यह है कि क्या इन समय-सीमाओं का पालन भी हो रहा है? यही है सिटीजन चार्टर का वास्तविक सच।

सरकारी कार्यालयों में वर्षों तक आम नागरिक की सबसे बड़ी शिकायत रही है—”आज नहीं, कल आइए”, “फाइल चल रही है”, “साहब मीटिंग में हैं।” इन समस्याओं से निजात दिलाने के उद्देश्य से सिटीजन चार्टर की अवधारणा सामने आई। इसका उद्देश्य था कि सरकार स्वयं यह घोषित करे कि कौन-सी सेवा कितने समय में उपलब्ध कराई जाएगी और यदि निर्धारित अवधि में सेवा नहीं मिलती है तो संबंधित अधिकारी जवाबदेह होगा।

गाजियाबाद में नगर निगम ने लगभग दो दशक पहले सिटीजन चार्टर लागू किया और बाद में इसे उत्तर प्रदेश सरकार की समयबद्ध सेवा व्यवस्था के अनुरूप और व्यवस्थित बनाया गया। आज नगर निगम के अलावा जिला प्रशासन, तहसील, राजस्व, खाद्य एवं रसद, समाज कल्याण, परिवहन, विद्युत तथा अन्य विभाग भी नागरिक सेवाओं के लिए समय-सीमा निर्धारित करने का दावा करते हैं। लेकिन नगर निगम का सिटीजन चार्टर सबसे विस्तृत और स्पष्ट रूप में उपलब्ध है।

चार्टर के अनुसार सड़क, नाली और सार्वजनिक स्थानों की सफाई, कूड़ा न उठने, सीवर जाम, गंदे पेयजल और स्ट्रीट लाइट खराब होने जैसी शिकायतों का निस्तारण 24 घंटे के भीतर होना चाहिए। सड़क पर गड्ढा भरने के लिए चार दिन, सड़क और नाली की मरम्मत के लिए सात दिन, अस्थायी अतिक्रमण हटाने के लिए पाँच दिन, स्थायी अतिक्रमण पर कार्रवाई के लिए दस दिन, सड़क पर सीवर का पानी भरने की समस्या के लिए तीन दिन, सीवर लाइन की मरम्मत के लिए 15 दिन, नामांतरण (म्यूटेशन) के लिए 45 दिन, जबकि संपत्ति कर एवं ट्रेड लाइसेंस संबंधी मामलों के लिए लगभग 48 दिन की समय-सीमा निर्धारित की गई है। यदि इन समय-सीमाओं का ईमानदारी से पालन हो तो नागरिकों को सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने की आवश्यकता ही न पड़े। लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग दिखाई देती है।

पिछले दस वर्षों में गाजियाबाद में सबसे अधिक शिकायतें सफाई, कूड़ा उठान, सीवर जाम, जलभराव, गंदे पेयजल, स्ट्रीट लाइट, अतिक्रमण, आवारा पशुओं और संपत्ति कर से संबंधित रही हैं। हर मानसून में जलभराव और सीवर की समस्या सुर्खियाँ बनती है। कई इलाकों में सफाई और कूड़ा उठान को लेकर स्थानीय निवासी बार-बार शिकायत दर्ज कराते हैं। नगर निगम ने मोबाइल ऐप, ऑनलाइन पोर्टल, हेल्पलाइन और जनसुनवाई जैसी डिजिटल व्यवस्थाएँ शुरू की हैं, जिससे शिकायत दर्ज कराना पहले की तुलना में आसान हुआ है। यह निश्चित रूप से एक सकारात्मक बदलाव है।

फिर भी सबसे बड़ा सवाल पारदर्शिता का है। यदि किसी नागरिक से पूछा जाए कि पिछले दस वर्षों में नगर निगम को कुल कितनी शिकायतें मिलीं, उनमें से कितनी निर्धारित समय-सीमा में निस्तारित हुईं, कितनी अभी भी लंबित हैं और कितने अधिकारियों पर कार्रवाई हुई, तो इसका स्पष्ट उत्तर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। विभिन्न विभाग अपने-अपने स्तर पर आँकड़े रखते हैं, लेकिन पूरे जिले का समेकित सिटीजन चार्टर रिपोर्ट कार्ड जनता के सामने नहीं रखा जाता। जब तक परिणाम सार्वजनिक नहीं होंगे, तब तक किसी भी व्यवस्था की सफलता का निष्पक्ष मूल्यांकन संभव नहीं है।

रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (आरडब्ल्यूए), व्यापारी संगठन और सामाजिक संस्थाएँ समय-समय पर यह शिकायत उठाती रही हैं कि कई मामलों में शिकायतों का समाधान केवल कागज़ों में दिखा दिया जाता है, जबकि वास्तविक समस्या बनी रहती है। कुछ नागरिकों का कहना है कि उन्हें एक ही शिकायत कई बार दर्ज करनी पड़ती है। विशेषकर सीवर, सफाई, जलभराव और स्ट्रीट लाइट जैसी समस्याओं में यह शिकायत अक्सर सुनने को मिलती है। उनका मानना है कि यदि निर्धारित समय-सीमा का पालन नहीं होता तो संबंधित अधिकारी की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।

दूसरी ओर प्रशासन का पक्ष भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। अधिकारियों का कहना है कि पहले की तुलना में शिकायत निस्तारण व्यवस्था कहीं अधिक पारदर्शी हुई है। ऑनलाइन जनसुनवाई, मोबाइल ऐप और नियमित समीक्षा बैठकों के माध्यम से शिकायतों की निगरानी की जाती है। उनका दावा है कि अधिकांश शिकायतों का समयबद्ध निस्तारण किया जाता है और जिन मामलों में देरी होती है, उनकी समीक्षा कर आवश्यक निर्देश दिए जाते हैं। प्रशासन का यह भी कहना है कि डिजिटल तकनीक के कारण अब शिकायतों की ट्रैकिंग संभव हो गई है और जवाबदेही पहले से बेहतर हुई है।

जनप्रतिनिधियों की राय भी इस मुद्दे पर विचारणीय है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों इस बात पर सहमत हैं कि सिटीजन चार्टर नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए आवश्यक व्यवस्था है। लेकिन वे यह भी कहते हैं कि इसका वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब इसका पूरी ईमानदारी से पालन हो। कई पार्षद नगर निगम की बैठकों में यह मुद्दा उठा चुके हैं कि शिकायतों का केवल ऑनलाइन निस्तारण दिखाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि मौके पर समस्या का वास्तविक समाधान होना चाहिए। विधायकों और जनप्रतिनिधियों ने भी समय-समय पर सफाई, सीवर, जलभराव और अतिक्रमण जैसी समस्याओं पर अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग की है।

दरअसल, सिटीजन चार्टर केवल एक प्रशासनिक दस्तावेज नहीं, बल्कि सरकार और नागरिक के बीच विश्वास का एक अनुबंध है। यदि सरकार स्वयं यह घोषणा करती है कि अमुक सेवा एक दिन, तीन दिन या सात दिन में उपलब्ध होगी, तो नागरिक को यह अधिकार मिलना चाहिए कि वह समय-सीमा का पालन न होने पर जवाब मांग सके। दुर्भाग्य से आज भी अधिकांश लोगों को यह पता ही नहीं है कि उनके अधिकार क्या हैं और शिकायत के निस्तारण की निर्धारित समय-सीमा क्या है।

समय आ गया है कि प्रत्येक विभाग हर महीने अपनी वेबसाइट पर यह प्रकाशित करे कि कितनी शिकायतें प्राप्त हुईं, कितनी निर्धारित समय-सीमा में निस्तारित हुईं, कितनी लंबित हैं और किन मामलों में अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई की गई। इससे न केवल प्रशासन की जवाबदेही बढ़ेगी, बल्कि नागरिकों का विश्वास भी मजबूत होगा। इसके साथ ही प्रत्येक सरकारी कार्यालय में सिटीजन चार्टर को प्रमुखता से प्रदर्शित किया जाना चाहिए और नागरिकों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया जाना चाहिए।

गाजियाबाद जैसे तेजी से विकसित हो रहे महानगर में सुशासन की पहचान केवल चौड़ी सड़कों, ऊँची इमारतों और नई परियोजनाओं से नहीं होगी, बल्कि इस बात से होगी कि एक सामान्य नागरिक की शिकायत कितनी जल्दी और कितनी ईमानदारी से सुनी और सुलझाई जाती है। सिटीजन चार्टर इसी कसौटी का नाम है।

सरकारी सेवाएँ किसी की कृपा नहीं, बल्कि नागरिक का संवैधानिक अधिकार हैं। यदि सिटीजन चार्टर केवल दीवार पर टंगा एक पोस्टर बनकर रह जाए, तो उसका कोई अर्थ नहीं। लेकिन यदि उसकी हर समय-सीमा का पालन हो, हर शिकायत का वास्तविक समाधान मिले और हर अधिकारी अपनी जवाबदेही स्वीकार करे, तभी कहा जा सकेगा कि सिटीजन चार्टर का सच वास्तव में नागरिक के पक्ष में खड़ा है।

— डॉ. चेतन आनंद
कवि एवं पत्रकार