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जब दुनिया को बच्चों की कमी सताने लगी: जनसंख्या विस्फोट से जनसंख्या संकट तक

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एक समय था जब बढ़ती जनसंख्या को मानव सभ्यता के लिए सबसे बड़ा खतरा माना जाता था। 1968 में अमेरिकी जीवविज्ञानी पॉल एहरलीच ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक द पापुलेशन बम में जनसंख्या विस्फोट की आशंका जताई थी। उस समय विश्व की आबादी लगभग 3.5 अरब थी, लेकिन आज यह 8 अरब से अधिक हो चुकी है। आश्चर्य की बात यह है कि अब दुनिया की चिंता बढ़ती आबादी नहीं, बल्कि घटती जन्मदर बन गई है।

विश्व के अधिकांश देशों में प्रजनन दर लगातार गिर रही है। जापान, दक्षिण कोरिया और चीन जैसे देशों के सामने घटती युवा आबादी, बढ़ते बुजुर्गों की संख्या और श्रमिकों की कमी गंभीर चुनौती बन चुकी है। जापान में गांव खाली हो रहे हैं, स्कूल बंद हो रहे हैं और सरकार लोगों को बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहन देने को मजबूर है। दक्षिण कोरिया में महंगी जीवनशैली और बदलती सामाजिक प्राथमिकताओं ने जन्मदर को ऐतिहासिक रूप से नीचे पहुंचा दिया है।

भारत आज दुनिया की सबसे युवा बड़ी आबादी वाला देश है, लेकिन यहां भी प्रजनन दर तेजी से घट रही है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार भारत की कुल प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर से नीचे पहुंच चुकी है। दिल्ली, पंजाब, केरल, तमिलनाडु और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में यह गिरावट और अधिक स्पष्ट दिखाई देती है।

बदलती जीवनशैली, शिक्षा, करियर की प्राथमिकता, बढ़ती आर्थिक जिम्मेदारियां और महिलाओं की बढ़ती भागीदारी के कारण युवा दम्पत्ति छोटे परिवार की ओर बढ़ रहे हैं। इसका सकारात्मक पक्ष यह है कि परिवारों की जीवन गुणवत्ता में सुधार होता है, लेकिन लंबे समय में अत्यधिक कम जन्मदर आर्थिक और सामाजिक चुनौतियां भी खड़ी कर सकती है।

20वीं सदी का सबसे बड़ा प्रश्न था कि जनसंख्या को कैसे नियंत्रित किया जाए, जबकि 21वीं सदी का उभरता हुआ सवाल यह है कि जनसंख्या संतुलन कैसे बनाए रखा जाए। यदि कार्यशील आबादी घटती है और बुजुर्गों की संख्या बढ़ती है तो आर्थिक विकास, सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।

भारत के पास अभी अपनी युवा शक्ति को शिक्षा, कौशल और रोजगार से जोड़कर जनसांख्यिकीय लाभांश का लाभ उठाने का सुनहरा अवसर है। हालांकि आने वाले दशकों में बदलती जनसंख्या संरचना को ध्यान में रखते हुए संतुलित और दूरदर्शी नीतियां बनाना समय की आवश्यकता होगी।

कल तक दुनिया बच्चों की बढ़ती संख्या से भयभीत थी, आज कई देश बच्चों की घटती संख्या से चिंतित हैं। यह मानव इतिहास का एक ऐसा जनसांख्यिकीय बदलाव है, जिसने विकास, अर्थव्यवस्था और समाज के भविष्य को लेकर नई बहस को जन्म दिया है।

लेखक: डॉ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)