महाशिवरात्रि विशेष

विष पीने वाला ही नहीं, विष को रोकने वाला ही है सच्चा शिव

आज के दौर में शिवत्व का वास्तविक अर्थ

महाशिवरात्रि केवल व्रत, जलाभिषेक और मंदिरों में दर्शन का पर्व नहीं है, बल्कि आत्ममंथन का भी अवसर है। भगवान शिव का संपूर्ण व्यक्तित्व त्याग, धैर्य, करुणा, न्याय और लोककल्याण का प्रतीक है। समुद्र मंथन के समय जब अमृत से पहले कालकूट विष निकला और उसके प्रभाव से संपूर्ण सृष्टि संकट में पड़ गई, तब देवता और दानव दोनों पीछे हट गए। ऐसे समय में भगवान शिव ने वह विष स्वयं ग्रहण कर लिया। उन्होंने उसे न निगला और न उगला, बल्कि अपने कंठ में धारण किया। तभी से वे नीलकंठ कहलाए।

यह प्रसंग आज भी उतना ही प्रासंगिक है, क्योंकि आज संसार में विष का स्वरूप बदल चुका है। अब यह विष नफरत, हिंसा, असहिष्णुता, झूठ, स्वार्थ, भ्रष्टाचार, प्रदूषण और मानसिक तनाव के रूप में हमारे सामने है।

शिवपुराण, भागवत पुराण और महाभारत में समुद्र मंथन का वर्णन मिलता है। इन ग्रंथों का संदेश स्पष्ट है कि समाज के कल्याण के लिए त्याग करने वाला ही सच्चे नेतृत्व का अधिकारी होता है। भारतीय दर्शन में भगवान शिव को केवल संहारक नहीं, बल्कि परिवर्तन और नवसृजन के देवता माना गया है। उनका विषपान यह सिखाता है कि समाज में उत्पन्न नकारात्मकता को समाप्त करने के लिए किसी न किसी को उसका भार उठाना ही पड़ता है।

भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं— “लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन् कर्तुमर्हसि” अर्थात समाज के व्यापक हित को ध्यान में रखकर कर्म करना ही श्रेष्ठ है। यद्यपि यह श्लोक सीधे भगवान शिव से संबंधित नहीं है, किंतु लोककल्याण की वही भावना शिव के विषपान में भी दिखाई देती है।

अक्सर लोग विष पीने का अर्थ केवल अन्याय सहना समझ लेते हैं, जबकि धर्मग्रंथ ऐसा नहीं कहते। शिव करुणा के साथ-साथ न्याय के भी प्रतीक हैं। जब अधर्म बढ़ता है, तब वही शिव रौद्र रूप धारण करते हैं। अर्थात शिव का संदेश है कि समाज की कटुता को अपने भीतर घृणा न बनने दें, लेकिन अन्याय का साहसपूर्वक प्रतिकार अवश्य करें।

आज का विष कैसा है?

आज समाज अनेक प्रकार के विष से घिरा हुआ है—

  • सोशल मीडिया पर झूठी खबरें और नफरत फैलाने वाले संदेश।
  • छोटी-छोटी बातों पर बढ़ती हिंसा और असहिष्णुता।
  • राजनीतिक कटुता का सामाजिक संबंधों पर प्रभाव।
  • परिवारों में संवाद का अभाव।
  • पर्यावरण प्रदूषण और प्रकृति का अंधाधुंध दोहन।
  • युवाओं में बढ़ता अवसाद, अकेलापन और मानसिक तनाव।
  • भ्रष्टाचार तथा नैतिक मूल्यों का निरंतर ह्रास।

इन परिस्थितियों में जो व्यक्ति धैर्य, विवेक और संयम बनाए रखते हुए समाज को जोड़ने का प्रयास करता है, वही आधुनिक अर्थों में शिवत्व का पालन कर रहा है।

पिछले कुछ वर्षों में देश ने अनेक ऐसी घटनाएँ देखी हैं, जहाँ धार्मिक, सामाजिक या राजनीतिक मतभेद तनाव का कारण बने। सोशल मीडिया पर फैलने वाली अफवाहों ने कई बार वास्तविक जीवन में हिंसा को जन्म दिया। मामूली विवाद भी गंभीर संघर्ष में बदलते दिखाई दिए। ऐसे समय में समाज को ऐसे लोगों की आवश्यकता है जो प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि समाधान का मार्ग चुनें; जो कटु भाषा का उत्तर कटुता से नहीं, बल्कि विवेक और संवाद से दें।

स्वामी विवेकानंद ने कहा था, “शक्ति वही है जो दूसरों के दुःख को अपना दुःख समझे।” शिव का विषपान इसी करुणा का सर्वोच्च उदाहरण है।

महात्मा गांधी का मानना था कि घृणा का उत्तर घृणा से नहीं दिया जा सकता। यद्यपि उन्होंने शिव के विषपान पर विशेष टिप्पणी नहीं की, पर उनका अहिंसा का सिद्धांत इसी भावना को पुष्ट करता है कि नकारात्मकता का उत्तर सकारात्मकता से दिया जाए।

आध्यात्मिक गुरु स्वामी चिन्मयानंद ने समुद्र मंथन को मनुष्य के मन का प्रतीक बताया। उनके अनुसार, जब मन का मंथन होता है तो सबसे पहले भीतर का विष—क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार—बाहर आता है। जो उसे नियंत्रित कर लेता है, वही आत्मविकास की ओर अग्रसर होता है।

श्री श्री रविशंकर भी अनेक अवसरों पर कह चुके हैं कि शिव का अर्थ असीम चेतना है। भीतर के क्रोध और तनाव को साध लेना ही शिवत्व की दिशा है।

शिवरात्रि हमें क्या सिखाती है?

शिवरात्रि केवल पूरी रात जागने का पर्व नहीं, बल्कि अपने भीतर जागने का अवसर है। यदि इस दिन हम यह संकल्प लें—

  • मैं झूठ और अफवाह नहीं फैलाऊँगा।
  • मैं कटु भाषा का प्रयोग नहीं करूँगा।
  • मैं पर्यावरण की रक्षा करूँगा।
  • मैं परिवार और समाज में संवाद बढ़ाऊँगा।
  • मैं कठिन परिस्थितियों में भी संयम बनाए रखूँगा।

तो यही सच्ची शिवभक्ति होगी।

मंदिर में जल चढ़ाना आस्था है, लेकिन किसी प्यासे को जल पिलाना शिव के संदेश को जीवन में उतारना है। बेलपत्र अर्पित करना पूजा है, किंतु समाज से ईर्ष्या, द्वेष और हिंसा का विष कम करना उससे भी बड़ी साधना है।

आज समाज को शिव क्यों चाहिए?

आज दुनिया तकनीकी रूप से जितनी विकसित हुई है, मानसिक रूप से उतनी ही बेचैन दिखाई देती है। सुविधाएँ बढ़ी हैं, लेकिन संतोष घटा है। संवाद बढ़ा है, पर समझ कम हुई है। ऐसे समय में शिव का संदेश केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और मानवीय आवश्यकता बन गया है।

आज हमें ऐसे शिक्षक चाहिए जो विद्यार्थियों का तनाव समझें, ऐसे माता-पिता चाहिए जो बच्चों को समय दें, ऐसे नेता चाहिए जो समाज को जोड़ें, ऐसे पत्रकार चाहिए जो सत्य, संतुलन और जिम्मेदारी का पालन करें तथा ऐसे नागरिक चाहिए जो मतभेदों के बावजूद एक-दूसरे का सम्मान करें। यही आधुनिक शिवत्व है।

भगवान शिव का विषपान केवल एक पौराणिक घटना नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के लिए एक शाश्वत आदर्श है। इसका अर्थ यह नहीं कि अन्याय को स्वीकार कर लिया जाए, बल्कि यह है कि समाज के हित में अपने अहंकार, क्रोध और स्वार्थ पर नियंत्रण रखा जाए तथा आवश्यकता पड़ने पर धर्म और न्याय की रक्षा के लिए साहसपूर्वक खड़ा हुआ जाए।

महाशिवरात्रि हमें यही संदेश देती है कि यदि हम अपने भीतर के विष—क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष, असत्य और अहंकार—का मंथन कर उसे नियंत्रित कर लें, तो प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में शिवत्व का स्पर्श पा सकता है।

सच तो यह है कि आज समाज को मंदिरों में जितने शिव चाहिए, उससे कहीं अधिक चरित्र में शिव चाहिए। क्योंकि विष पीने वाला ही नहीं, बल्कि विष को समाज में फैलने से रोकने वाला ही वास्तव में शिव कहलाने का अधिकारी है।

— डॉ. चेतन आनंद
कवि एवं पत्रकार