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विकास की रफ्तार और सुरक्षा की चुनौती: कब तक दरकते रहेंगे हमारे पुल, सड़कें और बांध?

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भारत आज विश्व की सबसे तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। पिछले डेढ़ दशक में देश ने सड़क, पुल, एक्सप्रेसवे, सुरंग, मेट्रो और बांध जैसे बुनियादी ढांचे के निर्माण में ऐतिहासिक प्रगति की है। राष्ट्रीय राजमार्गों का जाल 91 हजार किलोमीटर से बढ़कर लगभग 1.46 लाख किलोमीटर तक पहुंच चुका है, जबकि एक्सप्रेसवे नेटवर्क भी कई गुना बढ़ा है।

लेकिन विकास की इस चमक के पीछे एक चिंताजनक तस्वीर भी सामने आ रही है। पिछले कुछ वर्षों में मोरबी, वाराणसी, माजेरहाट और गम्भीरा जैसे पुल हादसों ने निर्माण गुणवत्ता, रखरखाव और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। इसी प्रकार मानसून के दौरान सड़कों का धंसना और पुराने बांधों की सुरक्षा भी बड़ी चुनौती बनती जा रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल नई परियोजनाओं का निर्माण ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनकी नियमित देखभाल, तकनीकी परीक्षण और सुरक्षा ऑडिट भी उतने ही आवश्यक हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती अतिवृष्टि और बाढ़ जैसी परिस्थितियां इन संरचनाओं पर अतिरिक्त दबाव डाल रही हैं।

सरकार ने इंडियन ब्रिज मैनेजमेंट सिस्टम, ड्रोन निरीक्षण, डैम सेफ्टी एक्ट 2021 और पुराने पुलों के स्ट्रक्चरल ऑडिट जैसे कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। फिर भी आवश्यकता है कि आधुनिक तकनीक, सेंसर आधारित निगरानी और जवाबदेही की व्यवस्था को और मजबूत बनाया जाए।

विकसित भारत की यात्रा केवल नए पुलों और चौड़ी सड़कों के निर्माण से पूरी नहीं होगी, बल्कि इन संरचनाओं की दीर्घकालिक सुरक्षा सुनिश्चित करने से ही विकास का वास्तविक उद्देश्य पूरा होगा। आज देश को यह प्रश्न पूछना होगा कि हमने कितना निर्माण किया ही नहीं, बल्कि उसे कितना सुरक्षित और टिकाऊ बनाए रखा। क्योंकि मजबूत राष्ट्र की पहचान केवल ऊंची इमारतों और विशाल पुलों से नहीं, बल्कि सुरक्षित और विश्वसनीय आधारभूत संरचनाओं से होती है।

लेखक: डॉ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)