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कानून सख्त, फिर भी सुरक्षित नहीं काला हिरण: छह वर्षों में 114 शिकार और मौतों ने बढ़ाई चिंता

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डॉ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

भारत की जैव विविधता में काला हिरण एक विशिष्ट स्थान रखता है। अपनी आकर्षक काया, सर्पिलाकार सींगों और अद्भुत गति के कारण यह देश के सबसे सुंदर वन्यजीवों में गिना जाता है। कभी भारतीय घासभूमियों में बड़ी संख्या में पाए जाने वाले काले हिरणों की आबादी बीसवीं शताब्दी में अंधाधुंध शिकार, कृषि विस्तार और प्राकृतिक आवासों के विनाश के कारण तेजी से घट गई थी। हालांकि वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 और बढ़ती जन-जागरूकता ने इस प्रजाति को नया जीवन दिया, लेकिन हालिया आंकड़े बताते हैं कि खतरा अभी टला नहीं है।

सामाजिक कार्यकर्ता एवं आरटीआई कार्यकर्ता डॉ. रंजन तोमर द्वारा प्राप्त जानकारी के अनुसार, वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो (डब्ल्यूसीसीबी) के रिकॉर्ड में वर्ष 2020 से अप्रैल 2026 तक काले हिरणों की मृत्यु अथवा शिकार से जुड़ी 114 घटनाएं दर्ज हुई हैं। यह संख्या बताती है कि कानूनी संरक्षण के बावजूद वन्यजीव अपराध पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं।

राजस्थान आज भी काले हिरणों का सबसे बड़ा गढ़ है, जहां इनकी संख्या 25 हजार से अधिक आंकी जाती है। ओडिशा, पंजाब, हरियाणा, गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में भी इनकी अच्छी-खासी आबादी मौजूद है। गुजरात का वेलावदर राष्ट्रीय उद्यान और राजस्थान का ताल छापर अभयारण्य इनके प्रमुख संरक्षण केंद्र हैं।

एंटीलोप सर्विकापरा नामक यह वन्यजीव दुनिया के सबसे तेज दौड़ने वाले खुरदार जीवों में शामिल है और 70 से 80 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार हासिल कर सकता है। नर काले हिरण अपने गहरे काले-भूरे रंग और लंबे घुमावदार सींगों के कारण विशेष पहचान रखते हैं।

काले हिरण को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की अनुसूची-1 में शामिल किया गया है, जो सर्वोच्च कानूनी सुरक्षा प्रदान करती है। इसके शिकार या अवैध व्यापार पर तीन से सात वर्ष तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान है। इसके बावजूद अवैध शिकार, आवासों का सिकुड़ना, सड़क दुर्घटनाएं, आवारा कुत्तों के हमले और मानव-वन्यजीव संघर्ष इनके लिए गंभीर खतरे बने हुए हैं।

काले हिरण संरक्षण की चर्चा 1998 के जोधपुर शिकार प्रकरण के बिना अधूरी है। इस मामले ने वन्यजीव संरक्षण कानूनों को राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया था और देशभर में वन्यजीव सुरक्षा को लेकर जागरूकता बढ़ाई थी।

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है। वन्यजीव जीवविज्ञानी अमित गोस्वामी के अनुसार बिश्नोई समाज ने काले हिरणों के संरक्षण में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। वहीं शोधकर्ता गीतांजलि मेरियासेल्वम और संरक्षण विशेषज्ञ टी. मुरुगावेल का कहना है कि घासभूमियों के संरक्षण, आधुनिक निगरानी प्रणाली, समुदाय आधारित संरक्षण योजनाओं और त्वरित न्यायिक प्रक्रिया के बिना दीर्घकालिक सफलता संभव नहीं है।

काला हिरण केवल एक वन्यजीव नहीं, बल्कि भारत की प्राकृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है। इसकी सुरक्षा केवल वन विभाग या सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज का दायित्व है। यदि सामूहिक प्रयास जारी रहे, तो आने वाली पीढ़ियां भी भारतीय घासभूमियों में दौड़ते हुए इस अद्भुत जीव को देख सकेंगी।