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“कला” जीवंत व्यक्तित्व का आभूषण : डॉ. राजेश श्रीवास्तव

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यूपी – गाजियाबाद। “कला” मानव जीवन का वह अनमोल आभूषण है जो व्यक्तित्व को न केवल संवारता है बल्कि उसे संवेदनशील और सृजनशील भी बनाता है। सृष्टि की रचना में परमपिता परमेश्वर ने मानव को श्रेष्ठ कृति के रूप में स्थापित कर उसे बुद्धि, विवेक और कला का उपहार दिया है, जिससे वह समाज को जागृत, समृद्ध और संस्कारित बना सके।

डॉ. राजेश श्रीवास्तव ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति के भीतर किसी न किसी रूप में कला निहित होती है, जिसे पहचानकर निखारना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि चित्रकला, संगीत, लेखन और अन्य सृजनात्मक कलाएँ मनुष्य को मानसिक तनाव, अवसाद और नकारात्मकता से दूर रखकर जीवन में संतुलन प्रदान करती हैं।

उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में सोशल मीडिया और भागदौड़ भरी जीवनशैली के बीच युवा वर्ग यदि अपनी कला को पहचानकर निरंतर साधना करे तो वह आत्मिक शांति और सफलता दोनों प्राप्त कर सकता है। कला न केवल अभिव्यक्ति का माध्यम है, बल्कि यह जीवन को सार्थक दिशा भी देती है।

डॉ. श्रीवास्तव ने कहा कि जीवन की कठिनाइयों से भागना समाधान नहीं है, बल्कि उनका सामना कर आगे बढ़ना ही वास्तविक जीवन कौशल है। उन्होंने सभी से अपनी कला को पहचानकर उसे विकसित करने और जीवन को सकारात्मक दिशा देने का आह्वान किया।