
शिक्षक दिवस, 5 सितम्बर पर विशेष
भारत आज युवा देश है। 15 से 25 वर्ष की आयु के करोड़ों युवा हमारी सबसे बड़ी शक्ति हैं। यही युवा आने वाले भारत की दिशा और दशा तय करेंगे। इसलिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, उचित प्रशिक्षण, संस्कार और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना केवल सरकार की नहीं, बल्कि पूरे समाज की साझा जिम्मेदारी है।
आज ज्ञान प्राप्त करने के लिए विद्यालयों और पुस्तकों के साथ इंटरनेट, यू-ट्यूब, गूगल और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे अनेक संसाधन उपलब्ध हैं। ऐसे में शिक्षक की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी दिलाना नहीं, बल्कि व्यक्ति को आत्मविश्वासी, आत्मनिर्भर, संवेदनशील, अनुशासित और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायी बनाना है।
हमें केवल विषय पढ़ाने वाले नहीं, बल्कि जीवन गढ़ने वाले अध्यापक चाहिए। शिक्षक को अपने कार्य को नौकरी नहीं, राष्ट्र-निर्माण का दायित्व समझना होगा। उसका लक्ष्य केवल विद्यार्थियों को अच्छे अंक दिलाना नहीं, बल्कि उनके मानसिक, बौद्धिक और नैतिक विकास के लिए समर्पण के साथ कार्य करना होना चाहिए। स्वयं कर्मठ, अनुशासित, राष्ट्रनिष्ठ और विषय के पारंगत शिक्षक ही विद्यार्थियों में इन गुणों का संचार कर सकते हैं।
विद्यार्थियों में श्रम, संघर्ष और आत्मनिर्भरता का संस्कार भी आवश्यक है। उन्हें यह सीखना चाहिए कि सफलता का कोई विकल्प परिश्रम नहीं है और सरकारी नौकरी ही जीवन की सफलता का एकमात्र मार्ग नहीं। युवा अपने ज्ञान और प्रतिभा के बल पर उद्यम स्थापित कर दूसरों के लिए भी रोजगार के अवसर पैदा करें।
शिक्षा के माध्यम से संस्कार, राष्ट्रबोध, मानवता और विविधता में एकता की भावना विकसित करना भी जरूरी है। विद्यार्थी जाति, संप्रदाय और अन्य विभाजनों से ऊपर उठकर मनुष्य को मनुष्य के रूप में देखना सीखें। भारत की विविधता ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है और सह-अस्तित्व भारतीय जीवन-दृष्टि का मूल आधार है।
आज आवश्यकता केवल अधिक शिक्षकों की नहीं, बल्कि कर्मठ, समर्पित और राष्ट्रनिष्ठ अध्यापकों की है। यदि शिक्षक बदलेंगे तो विद्यार्थी बदलेंगे, विद्यार्थी बदलेंगे तो समाज बदलेगा और समाज बदलेगा तो राष्ट्र नई ऊँचाइयों की ओर बढ़ेगा। यही सच्ची शिक्षा है और यही सच्चा राष्ट्र-निर्माण।
— डॉ. अशोक कुमार गदिया
कुलपति, मेवाड़ विश्वविद्यालय
चित्तौड़गढ़, राजस्थान

