युवाओं में बढ़ती हिंसा: क्या हम संवेदनशील समाज से दूर होते जा रहे हैं?

मानसिक स्वास्थ्य, परिवार, शिक्षा और सामाजिक मूल्यों पर गंभीर मंथन की जरूरत

भारत दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी वाला देश है। यही युवा देश के वर्तमान और भविष्य की सबसे बड़ी शक्ति हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में युवाओं से जुड़े जघन्य अपराधों की बढ़ती घटनाओं ने समाज को गंभीर चिंता में डाल दिया है। मामूली विवाद में हत्या, प्रेम संबंधों में बर्बरता, सड़क पर हिंसा, गैंग संस्कृति और सोशल मीडिया पर लोकप्रियता के लिए अपराध जैसी घटनाएँ यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि आखिर युवा मानसिकता किस दिशा में जा रही है।

गुरुग्राम का प्रद्युम्न हत्याकांड, हैदराबाद की महिला पशु चिकित्सक की हत्या, श्रद्धा वालकर हत्याकांड, दिल्ली की साक्षी हत्याकांड, पुणे पोर्शे हादसा और हाल के कई चर्चित अपराध इस बात का संकेत हैं कि कुछ मामलों में हिंसा पहले से अधिक निर्मम होती जा रही है। हालांकि यह भी उतना ही सत्य है कि देश के अधिकांश युवा ईमानदारी, परिश्रम और राष्ट्र निर्माण में लगे हुए हैं, लेकिन कुछ घटनाएँ पूरी पीढ़ी की छवि पर प्रश्नचिह्न लगा देती हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार आज का युवा मानसिक दबाव, प्रतिस्पर्धा, अकेलेपन, असफलता के भय और भावनात्मक असुरक्षा से जूझ रहा है। परिवारों में संवाद की कमी, संयुक्त परिवारों का विघटन, मोबाइल और सोशल मीडिया पर बढ़ती निर्भरता, नशे की प्रवृत्ति तथा गैंग संस्कृति भी युवाओं को नकारात्मक दिशा में धकेल रही है। मनोचिकित्सकों का मानना है कि समय पर भावनात्मक सहयोग और मनोवैज्ञानिक परामर्श न मिलने पर कुछ मामलों में यह आक्रामक व्यवहार का रूप ले सकता है।

आज आवश्यकता है कि विद्यालयों और महाविद्यालयों में मनोवैज्ञानिक परामर्शदाताओं की नियुक्ति हो, जीवन-कौशल, नैतिक शिक्षा, सहानुभूति और क्रोध-प्रबंधन को शिक्षा का हिस्सा बनाया जाए। माता-पिता बच्चों के साथ प्रतिदिन संवाद करें, खेल, साहित्य, संगीत और सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाए तथा सोशल मीडिया के जिम्मेदार उपयोग और नशा-विरोधी अभियानों को और प्रभावी बनाया जाए। साथ ही गंभीर अपराधों में त्वरित न्याय और प्रभावी कानून-व्यवस्था भी सुनिश्चित करनी होगी।

हिंसा केवल कानून के बल पर नहीं रुकेगी। परिवार, विद्यालय, समाज, मीडिया और सरकार सभी को मिलकर संवेदनशील, जिम्मेदार और नैतिक नागरिक तैयार करने होंगे। आर्थिक सफलता के साथ चरित्र निर्माण, मानवीय मूल्यों और करुणा को भी समान महत्व देना होगा। किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसके युवाओं के हाथों में होता है। इसलिए यह सुनिश्चित करना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है कि उन हाथों में किताब, कौशल और करुणा हो, हिंसा और हथियार नहीं।

— डॉ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)