Screenshot_20221103-203604_YouTube
IMG-20230215-WA0382
a12
IMG-20230329-WA0101
IMG-20240525-WA0039
PlayPause
previous arrow
next arrow

वीर सावरकर भारत की आजादी के संघर्ष में एक महान क्रांतिकारी थे : बीके शर्मा हनुमान

Share on facebook
Share on whatsapp
Share on twitter
Share on google
Share on linkedin

यूपी – गाजियाबाद वीर सावरकर जी के जन्म दिवस पर कवि नगर स्वर्गीय हरविलास गुप्ता शहीद फाउंडेशन व परमार्थ सेवा ट्रस्ट द्वारा वीर सावरकर जी की प्रतिमा पर पुष्पांजलि एवं शरबत वितरण का कार्यक्रम किया गया।

विश्व ब्रह्मऋषि ब्राह्मण महासभा के पीठाधीश्वर ब्रह्मऋषि विभूति बीके शर्मा हनुमान ने वीर सावरकर जी के जीवनी पर प्रकाश डालते हुए बताया कि वीर सावरकर भारत की आजादी के संघर्ष में एक महान ऐतिहासिक क्रांतिकारी थे। वह एक महान वक्ता, विद्वान, विपुल लेखक, इतिहासकार, कवि, दार्शनिक और सामाजिक कार्यकर्ता थे। वीर सावरकर का वास्तविक नाम विनायक दामोदर सावरकर था। वीर सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को नासिक के समीप भागपुर गाँव में हुआ था। उनके बड़े भाई गणेश (बाबराव), उनके जीवन की प्रतिष्ठा का एक प्रमुख स्रोत थे। वीर सावरकर बहुत कम उम्र के ही थे, जब उनके पिता दामोदरपंत सावरकर और माता राधाबाई की मृत्यु हो गई थी।

परमार्थ सेवा ट्रस्ट के चेयरमैन वी के अग्रवाल ने बताया कि वीर सावरकर की भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भागीदारी के कारण ब्रिटिश सरकार ने उनसे, उनकी स्नातक स्तर की डिग्री वापस ले ली। जून 1906 में, वीर सावरकर वकील बनने के लिए लंदन चले गए। उन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम पर आधारित ‘1857 में स्वतंत्रता के भारतीय युद्ध’ नामक एक किताब लिखी, जिस पर अंग्रेजों ने रोक लगा दी थी। जब वह लंदन में रह रहे थे, तभी उन्होंने इंग्लैण्ड में भारतीय छात्रों को ब्रिटिश औपनिवेशिक स्वामी के प्रति विद्रोह करने के लिए उत्साहित किया था। उन्होंने भारत की आजादी के संघर्ष में हथियारों का प्रयोग करने का समर्थन किया था। वीर सावरकर को उनके मुकदमे की जाँच के लिए 13 मार्च 1910 को लंदन से भारत भेजा जा रहा था, हालांकि अभी जहाज फ्रांस के मार्सिलेस में पहुँचा ही था कि वीर सावरकर वहाँ से बचकर भाग निकले, परन्तु फ्रांसीसी पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। उन्हें 24 दिसंबर 1910 को अंडमान में कारावास की सजा सुनाई गई। जेल में पुस्तकालय की स्थापना उनके ही प्रयासों का परिणाम था। उन्होंने जेल में अशिक्षित अपराधियों को शिक्षा देने की कोशिश की। विठ्ठलभाई पटेल, तिलक और गाँधी जैसे महान नेताओं की मांग पर सावरकर को 2 मई 1921 को भारत में वापस भेज दिया गया। वीर सावरकर रत्नागिरि जेल में कैद थे और उसके बाद उन्हें येरवादा जेल में स्थानांतरित कर दिया गया था। इन्होंने रत्नागिरी जेल में ही ‘हिंदुत्व’ नामक एक पुस्तक भी लिखी थी। उन्हें 6 जनवरी 1924 को जेल से रिहा कर दिया गया, बाद में उन्होंने प्राचीन भारतीय संस्कृति को बनाए रखने और सामाजिक कल्याण की दिशा में काम करने के लिए रत्नागिरी हिंदू महासभा की स्थापना की। इसके बाद में वह तिलक द्वारा बनाई गई स्वराज पार्टी में शामिल हो गए और हिंदू महासभा रूप में एक अलग राजनीतिक दल की स्थापना की और इसके अध्यक्ष के रूप में चुने गए। इस पार्टी ने पाकिस्तान के गठन का विरोध किया। गाँधी जी के हत्या करने वाले नाथूराम गोडसे भी हिंदू महासभा के सदस्य थे। महात्मा गांधी हत्या मामले में वीर सावरकर पर भारत सरकार द्वारा आरोप लगाया गया था, परन्तु भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें निर्दोष सबित कर दिया था। 26 फरवरी सन् 1966 में 83 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।

कार्यक्रम आयोजक राजीव मोहन साठे ग्रुप, रवी मोहन साठे ग्रुप, राकेश मोहन साठे ग्रुप, श्याम सुंदर, चंदन सिंह, सुनील शर्मा, वीके सिंघल, अखिलेश अग्रवाल, लोकेश सिंघल, डीके मित्तल, यू स गर्ग, प्रदीप गुप्ता, आर.एस कौशिक मौजूद रहे।