– डॉ. चेतन आनंद
भारतीय संस्कृति में माँ के दूध को “अमृत” माना गया है, लेकिन यदि उसी दूध में जहरीले तत्व मिलने लगें तो यह केवल स्वास्थ्य का नहीं, बल्कि पूरे समाज और पर्यावरण के लिए गंभीर चेतावनी है। बिहार से सामने आई हालिया शोध रिपोर्टों ने इस खतरे को उजागर किया है। पहले माताओं के दूध में आर्सेनिक, फिर सीसा और अब यूरेनियम जैसे रेडियोधर्मी तत्वों के अंश मिलने से वैज्ञानिक और चिकित्सक चिंतित हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह समस्या केवल माताओं तक सीमित नहीं, बल्कि दूषित पानी, मिट्टी और भोजन से जुड़ा बड़ा पर्यावरणीय संकट है।
हाल में बिहार के कटिहार, खगड़िया, समस्तीपुर, बेगूसराय, भोजपुर और नालंदा जिलों में स्तनपान कराने वाली महिलाओं के दूध की जांच में यूरेनियम के अंश पाए गए। इससे पहले हुए अध्ययनों में आर्सेनिक और सीसा भी खतरनाक मात्रा में मिले थे। वैज्ञानिकों के अनुसार दूषित भूजल, रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग, औद्योगिक कचरा और पर्यावरणीय लापरवाही इसके प्रमुख कारण हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि शिशुओं के लिए माँ का दूध अब भी सबसे सुरक्षित पोषण है, इसलिए स्तनपान बंद करने की जरूरत नहीं है। असली चिंता तेजी से विषाक्त होते पर्यावरण की है, जो मानव शरीर तक पहुँच चुका है। डॉक्टरों के अनुसार सीसा और आर्सेनिक जैसे तत्व बच्चों के मानसिक विकास, तंत्रिका तंत्र और स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल सकते हैं।
लेख में चेतावनी दी गई है कि यदि अभी भी जल, मिट्टी और हवा को बचाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियों को विषाक्त भविष्य विरासत में मिलेगा। सरकारों को शुद्ध पेयजल, भूजल जांच, औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण और मातृ-शिशु स्वास्थ्य निगरानी को प्राथमिकता देनी होगी। लेखक ने इसे केवल बिहार नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए चेतावनी बताते हुए पर्यावरण संरक्षण को मानव अस्तित्व बचाने का सबसे बड़ा प्रश्न बताया है।






