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प्रवासी भारतीयों की ताकत और आत्मनिर्भर भारत का सपना

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भारत आज विश्व की तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में अग्रणी स्थान बना रहा है। देश की आर्थिक प्रगति, वैश्विक प्रभाव और युवा शक्ति की चर्चा पूरी दुनिया में हो रही है। लेकिन इस विकास यात्रा के पीछे केवल देश के भीतर का उत्पादन और व्यापार ही नहीं, बल्कि विदेशों में बसे करोड़ों भारतीयों का भी बड़ा योगदान है। प्रवासी भारतीय हर वर्ष अरबों डॉलर भारत भेजकर देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान कर रहे हैं।

विश्व बैंक के अनुसार भारत लगातार दुनिया में सबसे अधिक रेमिटेंस प्राप्त करने वाला देश बना हुआ है। वर्ष 2024 में प्रवासी भारतीयों ने लगभग 137-138 अरब डॉलर भारत भेजे, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह धन लाखों परिवारों की शिक्षा, स्वास्थ्य, मकान निर्माण, खेती और छोटे व्यवसायों का आधार बनता है। विशेष रूप से केरल, पंजाब, गुजरात, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में इसका प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है।

इसके बावजूद भारत के सामने भारी आयात बिल एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। पेट्रोलियम, गैस, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा उपकरण और विशेष रूप से सोने के आयात पर हर वर्ष भारी विदेशी मुद्रा खर्च होती है। भारत हर साल लगभग 700 से 900 टन सोना आयात करता है, जिससे डॉलर पर दबाव बढ़ता है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी “डॉलर बचाओ”, “वोकल फॉर लोकल” और “आत्मनिर्भर भारत” जैसे अभियानों पर लगातार जोर देते रहे हैं।

मोदी सरकार का मानना है कि यदि भारत अपनी आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन स्वयं करेगा तो आयात कम होगा, रोजगार बढ़ेंगे और विदेशी मुद्रा की बचत होगी। मोबाइल निर्माण, रक्षा उत्पादन, इलेक्ट्रॉनिक्स और सौर ऊर्जा के क्षेत्र में भारत ने उल्लेखनीय प्रगति भी की है।

हालांकि अर्थशास्त्रियों का मत है कि केवल विदेशी मुद्रा बचाना ही पर्याप्त नहीं है। नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन और अभिजीत बनर्जी जैसे अर्थशास्त्री शिक्षा, स्वास्थ्य और बेहतर वित्तीय विकल्पों पर भी बल देते हैं। उनका मानना है कि लोगों को सुरक्षित निवेश के विकल्प उपलब्ध कराए बिना सोने की खपत कम करना संभव नहीं है।

आज भारत के सामने सबसे बड़ा अवसर यह है कि वह अपने प्रवासी भारतीय समुदाय की आर्थिक शक्ति, तकनीकी अनुभव और वैश्विक नेटवर्क का सही उपयोग करे। यदि भारत उत्पादन, निर्यात, शिक्षा और तकनीकी आत्मनिर्भरता को संतुलित रूप से आगे बढ़ाता है, तो आने वाले वर्षों में वह विश्व की सबसे शक्तिशाली अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो सकता है।

लेखक : डॉ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)