– डॉ. अशोक कुमार गदिया
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है, जहाँ राजनीति का मूल उद्देश्य समाज को जोड़ना, नागरिकों के जीवन स्तर को ऊपर उठाना और राष्ट्र को विकास की दिशा में अग्रसर करना होना चाहिए। किंतु वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य अनेक गंभीर प्रश्न खड़े करता है। आज राजनीति का केंद्र राष्ट्रहित से हटकर जातीय और साम्प्रदायिक समीकरणों पर अधिक आधारित दिखाई देता है। चुनाव आते ही विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और आर्थिक सुधार जैसे मूल मुद्दे पीछे छूट जाते हैं तथा जाति और धर्म वोट का प्रमुख आधार बन जाते हैं। यह स्थिति लोकतंत्र की आत्मा के लिए चिंताजनक है।
आज राजनीति ने समाज को जातियों और सम्प्रदायों में विभाजित करने का कार्य किया है। चुनावों में उम्मीदवारों का मूल्यांकन उनके कार्यों और नीतियों से अधिक उनकी जातीय एवं धार्मिक पहचान के आधार पर होने लगा है। इससे सामाजिक समरसता कमजोर हुई है और राष्ट्रीय एकता को चुनौती मिली है। राजनीति का उद्देश्य समाज को जोड़ना होना चाहिए, विभाजित करना नहीं।
वहीं दूसरी ओर आम नागरिक महँगाई, बेरोजगारी, आर्थिक असमानता, न्याय व्यवस्था, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी समस्याओं से जूझ रहा है, लेकिन चुनावी मंचों पर इन विषयों पर गंभीर चर्चा कम दिखाई देती है। घोषणापत्रों में इनका उल्लेख अवश्य होता है, परंतु राजनीतिक विमर्श में भावनात्मक और विभाजनकारी मुद्दे अधिक हावी रहते हैं।
देश में भ्रष्टाचार, प्रशासनिक अव्यवस्था और नौकरशाही की निरंकुशता भी लोकतंत्र को कमजोर कर रही है। जनप्रतिनिधियों के ऐशोआराम, सत्ता के दुरुपयोग और अनैतिक आचरण पर प्रभावी नियंत्रण नहीं दिखाई देता। शासन व्यवस्था का उद्देश्य जनसेवा होना चाहिए, किंतु कई बार राजनीति व्यक्तिगत लाभ और सत्ता संरक्षण का माध्यम बनती प्रतीत होती है।
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कही जाने वाली मीडिया की भूमिका भी आज सवालों के घेरे में है। निष्पक्ष पत्रकारिता के स्थान पर टीआरपी और व्यावसायिक हितों को प्राथमिकता दी जा रही है। अधूरी और भ्रामक सूचनाएँ समाज में भ्रम तथा तनाव पैदा करती हैं। मीडिया का दायित्व सत्य को सामने लाना और समाज को सही दिशा देना है।
इसके साथ ही न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका के बीच संतुलन का अभाव भी लोकतांत्रिक व्यवस्था को प्रभावित कर रहा है। कई बार सरकार और न्यायपालिका के बीच प्रत्यक्ष या परोक्ष टकराव की स्थिति देखने को मिलती है, जिससे प्रशासनिक अराजकता और भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है।
चुनावी प्रक्रिया इतनी महँगी हो चुकी है कि ईमानदार, योग्य और स्वाभिमानी व्यक्ति के लिए चुनाव लड़ना कठिन होता जा रहा है। राजनीति में धनबल और बाहुबल का बढ़ता प्रभाव लोकतंत्र के वास्तविक स्वरूप को कमजोर कर रहा है। यदि राजनीति केवल आर्थिक रूप से शक्तिशाली लोगों तक सीमित हो जाएगी, तो सामान्य और प्रतिभाशाली नागरिकों की भागीदारी घटती जाएगी।
इन परिस्थितियों के बीच भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसका युवा वर्ग है। देश में 15 से 30 वर्ष की आयु के लगभग 30 करोड़ युवा हैं। यदि इस ऊर्जा को सही दिशा मिले तो भारत विश्व की अग्रणी शक्ति बन सकता है। इसके लिए युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल प्रशिक्षण, संस्कार और आत्मनिर्भरता से जोड़ना आवश्यक है।
आज राष्ट्र निर्माण का सबसे बड़ा दायित्व समाज, सरकार और परिवार पर है। युवाओं के भीतर राष्ट्रप्रेम, आत्मविश्वास और अपनी संस्कृति के प्रति गर्व की भावना विकसित करनी होगी। जब युवा अपने देश के लिए जीना और आवश्यकता पड़ने पर त्याग करना सीखेंगे, तभी भारत वास्तव में सशक्त, विकसित और विश्वगुरु बनने की दिशा में आगे बढ़ सकेगा।
समय की माँग है कि जातिगत और साम्प्रदायिक राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए। राजनीति सेवा का माध्यम बने, समाज में समरसता बढ़े और राष्ट्र निर्माण सर्वोच्च लक्ष्य बने — यही आज के भारत की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
(लेखक के चेयरमैन हैं।)








