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रहिमन धागा प्रेम का…

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“रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाए,
जोड़े  से फिर न जुड़े, जुड़े गांठ पड़ जाये।”

जीहां, ठीक ही कहा है रहीमदास जी ने। कभी हम भी सोचा करते थे कि प्रेम बाँटने से बढ़ता है, इसलिए अपनी परवाह किये  बगैर,अपनी पॉकेट लगातार हल्की करते रहे, अपनी उम्र के अधिकांश कीमती दिन, महीने, घंटे, मिनट्स, यहाँ तक कि अपने गुण , अपनी कला, अपनी सोच, अपनी कल्पना, अपना लेखन तक सब ताक पर रख दिया, ये सोचकर कि प्रेम बाँटने से बढ़ता है, लेकिन अब जाकर  पता चला कि प्यारे ये दुनिया  है, जैसे को तैसे की कहावत भी यहीं पर चलती है, समय को देखो, समय की धार को पहचानो, तब जाकर प्रेम या जैसे को तैसे वाला बर्ताव करो, मगर हम कभी न समझे, समझते भी कैसे, इतनी  समझ कभी आई नहीं कि क्या और कैसा बर्ताव किससे , कैसे और कब करना चाहिए, अपनी ज़िन्दगी की दुकान  में तो बस एक ही सौदा है-प्रेम……..अब करें भी तो क्या। हमारे एक मित्र हैं, खूब कहते हैं, खूब घूमते हैं, खूब सोते हैं, खूब गुस्सा करते हैं और खूब झूठ बोलकर खूब सारी बातें छिपाने की महारत रखते हैं. एक दिन बोले यार अब से कोई बात नहीं छिपानी, ज़िन्दगी का हर पल शेयर करेंगे। हम भी बोल पड़े ओक्के। अब हुआ कुछ और— हम तो हर बात को बताना सीख गए और वो—- अपनी बात को छिपाने के रस्ते पर चल पड़े, एक दिन ऐसा आया कि वो श्रीमान ५ दिन की यात्रा पर चुपके से निकल गए. जब पता चला तो हम भी गुस्से में दो दिन आउटिंग पर चले गए, अब हुआ क्या, दो दिन की आउटिंग की बात पता चलते ही उनका  पारा तो सातवें आसमान पर जा पहुंचा, लगे गालियां देने, तेवर दिखाने—–. जब हमने पूछा कि श्रीमान आप भी तो बिना बताये ५ दिन ग़ायब हो गए थे, तो बोले फिर क्या हुआ— हमने आकर बता दिया न…. सुनकर हम तिलमिला उठे —- बस साहब हमने सोच लिया कि अब ऐसे शख्स का साथ हम नहीं देंगे जो अपने लिए तो छूट लिए घूमता हो और दूसरों पर पाबंदियां लगता हो, ठीक ऐसा ही हाल हमारी राजनीति का भी हो चला है, नेता चाहे जहाँ घूमे, जितने झूठ बोले, जो चाहे वो करे, मगर आम जनता को अपने घर के खूँटें से बंधी निरीह बकरी ही समझता है. अब खूंटा तोड़ो तो मरे और न तोड़ो– तो भी मरे. हम तो नेता जी से प्रेम का धागा जोड़े बैठे थे मगर वो तो धागा तोड़कर, हमारे गले और पैरों में ज़ंजीर डालने का काम करने में जुटे हैं, इसलिए मौका है कि जनता अपनी ताकत पहचाने और तय करे कि किससे प्रेम वाला बर्ताव करना है और किससे दो-दो हाथ करने हैं.

डॉ. चेतन आनंद

(कवि एवं पत्रकार)