“भगवान बुद्ध और संत कबीर के बाद महात्मा ज्योतिराव फूले मेरे तीसरे पथ-प्रदर्शक रहे।” — डॉ. भीमराव अंबेडकर
11 अप्रैल को महात्मा ज्योतिराव फूले की जयंती सामाजिक न्याय, समानता और शिक्षा के महत्व को स्मरण करने का अवसर है। महात्मा ज्योतिराव फूले आधुनिक भारत के ऐसे महान चिंतक थे, जिन्होंने समाज में व्याप्त छुआछूत, अंधविश्वास और असमानता के खिलाफ आजीवन संघर्ष किया।
उन्होंने महिलाओं और वंचित वर्गों की शिक्षा को समाज परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम माना। 1848 में उन्होंने देश की पहली कन्या पाठशाला की स्थापना की, जिसमें उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले ने पहली अध्यापिका के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। फूले ने विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया और महिलाओं के सम्मान व अधिकारों के लिए अनेक प्रयास किए।
किसानों, मजदूरों और शोषित वर्ग के हितों के लिए संघर्ष करते हुए उन्होंने “सत्यशोधक समाज” की स्थापना की, जिसका उद्देश्य सामाजिक कुरीतियों का उन्मूलन और समानता आधारित समाज का निर्माण था।
फूले का मानना था कि शिक्षा ही मानसिक गुलामी से मुक्ति का मार्ग है। उनके विचार आज भी प्रासंगिक हैं, जब समाज को समरसता, भाईचारे और समानता की सबसे अधिक आवश्यकता है।
महात्मा फूले का जीवन हमें प्रेरित करता है कि हम एक समावेशी और न्यायपूर्ण समाज के निर्माण का संकल्प लें। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
— राम दुलार यादव, शिक्षाविद
संस्थापक/अध्यक्ष, लोक शिक्षण अभियान ट्रस्ट





