वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव केवल दो देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका व्यापक प्रभाव विश्व राजनीति, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा पर पड़ता है। भारत जैसे ऊर्जा-निर्भर और विकासशील देश के लिए यह स्थिति विशेष महत्व रखती है। हालिया युद्धविराम से भले ही अस्थायी राहत मिली हो, लेकिन दीर्घकालिक रणनीति के तहत भारत को सतर्क और संतुलित नीति अपनानी होगी।

भारत की विदेश नीति का मूल आधार संतुलन होना चाहिए। एक ओर अमेरिका के साथ उसके रणनीतिक और आर्थिक संबंध हैं, तो दूसरी ओर ईरान के साथ ऊर्जा और क्षेत्रीय सहयोग जुड़ा हुआ है। ऐसे में भारत को “रणनीतिक स्वायत्तता” बनाए रखते हुए दोनों देशों के साथ संतुलित संबंध कायम रखने होंगे।
ऊर्जा सुरक्षा भी एक अहम मुद्दा है। भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, जिसमें खाड़ी क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसलिए नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों—सौर, पवन और जैव ईंधन—की ओर तेजी से बढ़ना आवश्यक है। साथ ही इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देकर तेल पर निर्भरता कम करनी होगी।
समुद्री सुरक्षा के लिहाज से भी भारत को सतर्क रहना होगा। अरब सागर और खाड़ी क्षेत्र से गुजरने वाले व्यापारिक मार्ग देश की आर्थिक जीवनरेखा हैं। भारतीय नौसेना की सक्रियता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से इन मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करना जरूरी है।
आर्थिक स्थिरता बनाए रखना भी चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि क्षेत्रीय तनाव से तेल कीमतों में उछाल आता है, जिसका असर महंगाई और बाजार पर पड़ता है। भारत को अपने विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत रखते हुए वैकल्पिक आपूर्ति स्रोत विकसित करने होंगे।
अंततः, भारत को वैश्विक मंचों पर शांति और संवाद का समर्थक बनकर उभरना चाहिए। परिस्थितियां अनुकूल होने पर वह मध्यस्थ की भूमिका निभाकर अपनी अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को और मजबूत कर सकता है।
लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)





