Screenshot_20221103-203604_YouTube
IMG-20230215-WA0382
a12
IMG-20230329-WA0101
Final Ad
Screenshot_20251019_113536_OneDrive
screenshot_20260125_230217_gallery4476655999519321620.jpg
PlayPause
previous arrow
next arrow

मज़हबी कट्टरता से निपटने की चुनौती

Share on facebook
Share on whatsapp
Share on twitter
Share on google
Share on linkedin

नफरत नहीं, संवाद और शिक्षा ही बना सकते हैं समरस भारत

लेखक: डॉ. अशोक कुमार गदिया
चेयरमैन, मेवाड़ यूनिवर्सिटी, चित्तौड़गढ़

पिछले कुछ वर्षों में देश में मज़हबी कट्टरता और नफरत की घटनाओं में चिंताजनक वृद्धि हुई है। यह केवल सामाजिक ताने-बाने को ही नहीं तोड़ रही, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी गंभीर खतरा बनती जा रही है। विघटनकारी शक्तियां नहीं चाहतीं कि देश में समरसता और विकास का वातावरण बने। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि हम गंभीरता से विचार करें कि इन ताकतों का मुकाबला कैसे किया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियों को नफरत का दंश न झेलना पड़े।

हाल के वर्षों में कई राज्यों, विशेषकर उत्तर भारत में, मज़हबी उन्माद की घटनाएं सामने आई हैं। यदि समय रहते सरकार और समाज ने मिलकर ठोस प्रयास नहीं किए, तो देश का धर्मनिरपेक्ष ढांचा कमजोर हो सकता है।

भारत विविधताओं का देश है—धर्म, भाषा, संस्कृति और परंपराओं का अद्भुत संगम। यह एक ऐसे गुलदस्ते की तरह है जिसमें विभिन्न रंगों और सुगंधों वाले फूल साथ मिलकर वातावरण को महकाते हैं। किंतु मज़हबी नफरत इस सुगंध को विषाक्त करने का कार्य कर रही है।

हालांकि सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं में कमी आई है, जो सकारात्मक संकेत है, लेकिन कट्टरता और विभाजनकारी विचारधाराएं तेजी से फैल रही हैं। कुछ नेता और धार्मिक अगुवा खुलेआम ऐसे बयान दे रहे हैं जो समाज को बांटते हैं। यह चिंताजनक है कि कुछ व्यक्तियों के कृत्यों के आधार पर पूरे समुदाय को दोषी ठहराने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। इतिहास साक्षी है कि हर समाज में संत और शहीद भी हुए हैं, केवल अपराधी ही नहीं।

जब तक हम धर्म, जाति और क्षेत्रवाद की संकीर्ण मानसिकता से ऊपर नहीं उठेंगे, तब तक समृद्ध और शांतिपूर्ण समाज की कल्पना अधूरी रहेगी। जातिवाद और धार्मिक ध्रुवीकरण राजनीति का उपकरण बनते जा रहे हैं। यदि हम इस दुष्चक्र से मुक्त नहीं हुए, तो विकसित भारत का सपना अधूरा रह जाएगा।

हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि हमारी पहली पहचान भारतीय नागरिक की है। “हम भारतीय हैं” की भावना ही हमारे अधिकांश मतभेदों को समाप्त कर सकती है।

इतिहास में आक्रमण और सत्ता संघर्ष अधिकतर साम्राज्य विस्तार की महत्वाकांक्षा से प्रेरित रहे हैं, न कि किसी धर्म के वास्तविक संदेश से। किसी भी धर्म की मूल शिक्षाएं हिंसा और घृणा का समर्थन नहीं करतीं। इसलिए इतिहास की घटनाओं को वर्तमान की नफरत का आधार बनाना अनुचित है।

चुनावों और त्योहारों के दौरान कट्टरता का उभार और भी खतरनाक रूप ले लेता है। सोशल मीडिया पर भड़काऊ सामग्री और उग्र भाषण समाज को विभाजित कर रहे हैं। इससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि कट्टरपंथियों का महिमामंडन होने लगा है।

भारत की परंपरा सद्भाव और सहअस्तित्व की रही है। महावीर, बुद्ध, विवेकानंद, गांधी, सुभाषचंद्र बोस, सर सैयद अहमद खां जैसे महापुरुषों ने मानवता और एकता का संदेश दिया। इतिहास गवाह है कि महाराणा प्रताप की सेना में हकीम खान, शिवाजी की सेना में मुस्लिम वीर सैनिक, और रानी लक्ष्मीबाई के साथ गुलाम गौस खान जैसे योद्धा रहे—ये उदाहरण दर्शाते हैं कि हमारी विरासत साझा है।

स्वतंत्रता संग्राम भी हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक था। गांधी और खान अब्दुल गफ्फार खां जैसे नेताओं ने मिलकर आज़ादी की लड़ाई लड़ी। यह हमारी साझा विरासत है, जिसे भुलाकर हम कट्टरता की ओर बढ़ रहे हैं।

समाधान शिक्षा और संवाद में निहित है। प्राथमिक स्तर से ही बच्चों में विभिन्न धर्मों के प्रति सम्मान और समझ विकसित करनी होगी। विद्यालयों और मदरसों में तथ्यात्मक और संतुलित जानकारी दी जानी चाहिए। सामुदायिक स्तर पर भी धर्मगुरुओं और बुद्धिजीवियों को मिलकर कट्टरता के विरुद्ध राष्ट्रव्यापी अभियान चलाना चाहिए।

भगवान बुद्ध ने कहा था—“घृणा को घृणा से नहीं जीता जा सकता।” भारत का “वसुधैव कुटुंबकम” का सिद्धांत हमें यही सिखाता है कि संपूर्ण विश्व एक परिवार है।

यदि हमें एक विकसित, समृद्ध और शक्तिशाली भारत का निर्माण करना है, तो मज़हबी कट्टरता और नफरत को त्यागना होगा। भारत तभी महान बनेगा जब वह सबका होगा—और यह तभी संभव है जब हम अपने भीतर से कट्टरता को समाप्त कर सकें।