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जीवन में धर्म की रक्षा के लिए त्याग ही सबसे बड़ा आभूषण : विजय कौशल महाराज

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यूपी – गाजियाबाद। कविनगर स्थित रामलीला मैदान में मंगलमय परिवार के तत्वावधान में आयोजित भव्य श्रीरामकथा के पंचम दिवस पर गुरुवार को भगवान राम के वनगमन का अत्यंत करुण, भावनात्मक और प्रेरक प्रसंग प्रस्तुत किया गया। कथा श्रवण के दौरान श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे और वातावरण त्याग, भक्ति व करुणा से ओतप्रोत हो गया।

कथा व्यास विजय कौशल महाराज ने रामकथा के पांचवें दिन राज्याभिषेक की तैयारियों से लेकर कोप भवन प्रसंग, वनगमन, निषादराज गुह से भेंट और केवट की निष्काम भक्ति का सजीव वर्णन किया। उन्होंने कहा कि राम का वनगमन केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि यह संदेश है कि धर्म, वचन और मर्यादा राजसुख से भी ऊपर हैं। जीवन में धर्म की रक्षा के लिए त्याग ही सबसे बड़ा आभूषण है।

महाराज ने बताया कि जैसे ही वनगमन का निर्णय हुआ, अयोध्या शोक में डूब गई। माता कौशल्या की करुण पुकार, भरत का विलाप और प्रजा की व्याकुलता के प्रसंग सुनकर श्रोताओं के नेत्र सजल हो गए। तमसा नदी के तट पर प्रभु द्वारा बिताई गई पहली रात्रि को राजकुमार राम से तपस्वी राम की यात्रा का प्रारंभ बताया गया, जहाँ मोह का त्याग और संयम का वरण होता है।

निषादराज गुह से भेंट का प्रसंग सामाजिक समरसता और सच्ची मित्रता का प्रतीक बताया गया। वहीं केवट प्रसंग को भक्ति का शिखर बताते हुए कहा गया कि निष्काम भाव से की गई भक्ति ही मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती है। कथा के समापन पर ऋषि भरद्वाज के आश्रम आगमन और वनवासी जीवन की मर्यादा का वर्णन किया गया।

श्रीरामकथा ने यह संदेश दिया कि त्याग में ही सच्चा सुख, भक्ति में ही मुक्ति और मर्यादा ही जीवन का सर्वोच्च धर्म है। कथा में मंगलमय परिवार के सदस्य सहित हजारों श्रद्धालु उपस्थित रहे।