डॉ. अशोक कुमार गदिया
23 जनवरी को नेताजी सुभाषचंद्र बोस की जयंती देशभर में श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाई जाती है। भले ही नेताजी लालकिले पर तिरंगा न फहरा सके हों, लेकिन भारत को आज़ादी दिलाने में उनका योगदान अतुलनीय और अविस्मरणीय है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि नेताजी के बिना स्वतंत्रता संग्राम अधूरा रहता। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन देश के लिए समर्पित कर दिया और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखा।
नेताजी सुभाषचंद्र बोस असाधारण प्रतिभा के धनी थे। आईसीएस जैसी सर्वोच्च परीक्षा उत्तीर्ण करने के बावजूद उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत की नौकरी ठुकरा दी और स्वतंत्रता संग्राम का मार्ग चुना। कांग्रेस के अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने अंग्रेजों को देश छोड़ने की खुली चुनौती दी। बाद में आज़ाद हिन्द फौज का गठन कर उन्होंने सशस्त्र संघर्ष के माध्यम से स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त किया। जापान के सहयोग से गठित आज़ाद हिन्द फौज ने अंडमान-निकोबार, इम्फाल और कोहिमा में अंग्रेजों को कड़ी चुनौती दी।
नेताजी के आह्वान से देश-विदेश में बसे भारतीयों ने तन-मन-धन से सहयोग किया। महिलाओं ने अपने आभूषण तक राष्ट्र के लिए समर्पित कर दिए। आज़ाद हिन्द फौज की गतिविधियों से ब्रिटिश सेना में भी शामिल भारतीय सैनिकों में आत्मग्लानि पैदा हुई, जिसने अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया।
नेताजी का जीवन त्याग, साहस और देशभक्ति की प्रेरणादायक मिसाल है। शिक्षकों और युवाओं को उनके विचारों से प्रेरणा लेकर राष्ट्र निर्माण में योगदान देना चाहिए। नेताजी का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है—देश के लिए जीना और मरना ही सच्ची देशभक्ति है।
लेखक
डॉ. अशोक कुमार गदिया
(कुलाधिपति, मेवाड़ विश्वविद्यालय)







