दिल्ली – दिल्ली-एनसीआर लंबे समय से हिंदी कवि सम्मेलनों और उर्दू मुशायरों का प्रमुख केंद्र रहा है। यहाँ की साहित्यिक महफ़िलों ने देश को अनेक बड़े कवि, शायर और साहित्यिक आंदोलनों की सौगात दी है। कभी ये मंच विचारों की उर्वर भूमि हुआ करते थे, जहाँ रचना की गुणवत्ता, संवेदना और वैचारिक गहराई ही कवि की पहचान होती थी।
लेकिन यदि आज के परिदृश्य को ईमानदारी से देखा जाए, तो दिल्ली-एनसीआर के अधिकांश कवि सम्मेलनों और मुशायरों पर गुटबाज़ी की गहरी छाया साफ़ दिखाई देती है। यह गुटबाज़ी अब साहित्य से अधिक संबंधों, समीकरणों और स्वार्थों पर आधारित होती जा रही है।
गुटबाज़ी का बदलता स्वरूप
आज की गुटबाज़ी वैचारिक बहस या साहित्यिक मतभेद तक सीमित नहीं रही। यह व्यक्तिगत निकटताओं, आयोजकों से रिश्तों, मंच संचालकों की पसंद-नापसंद और सोशल मीडिया नेटवर्किंग पर आधारित हो गई है। कई बार किसी कवि का मंच पर आना उसकी रचना की ताकत से नहीं, बल्कि इस बात से तय होता है कि वह किस गुट से जुड़ा है।
“आप हमारे कार्यक्रम में आइए, हम आपको अपने कार्यक्रम में बुलाएँगे”—यह आपसी लेन-देन आज मंच चयन की सबसे प्रचलित कसौटी बन चुकी है।
वही चेहरे, वही आवाज़ें
दिल्ली, गाजियाबाद, नोएडा, फरीदाबाद और गुरुग्राम—लगभग हर साहित्यिक आयोजन में बार-बार वही चेहरे दिखाई देते हैं। श्रोता कई बार यह महसूस करता है कि कार्यक्रम बदल गया है, लेकिन कवि-सूची वही है। इससे मंच की विविधता समाप्त होती है और नए व युवा रचनाकारों के लिए दरवाज़े बंद हो जाते हैं। अनेक प्रतिभाशाली कवि वर्षों तक मंच से बाहर रह जाते हैं, जबकि औसत रचनाएँ लिखने वाले लोग केवल गुटीय पहचान के कारण मंच पर बने रहते हैं।
युवा कवियों के लिए कठिन राह
गुटबाज़ी का सबसे गहरा दुष्प्रभाव युवा कवियों पर पड़ता है। कई आयोजनों में उनसे अप्रत्यक्ष रूप से आर्थिक सहयोग की अपेक्षा की जाती है, या यह संकेत दिया जाता है कि पहले “हमारे लोगों” के कार्यक्रमों में नियमित उपस्थिति दर्ज कराइए। परिणामस्वरूप कई युवा कवि मंचीय कविता से दूरी बना लेते हैं और कुछ साहित्य से ही विमुख हो जाते हैं। यह स्थिति साहित्यिक भविष्य के लिए चिंताजनक है।
विचारधारा की राजनीति
दिल्ली-एनसीआर के कवि सम्मेलनों में अब वैचारिक गुट भी स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे हैं। कुछ मंच केवल एक खास विचारधारा से जुड़े कवियों को ही आमंत्रित करते हैं। जो कवि उस खांचे में फिट नहीं बैठता, उसे—even यदि उसकी रचना उत्कृष्ट हो—मंच नहीं मिलता। साहित्य, जो विविध दृष्टियों को स्वीकार करने की परंपरा रहा है, आज कई जगह संकीर्णता का शिकार होता दिख रहा है।
मंच संचालन भी गुटीय
मंच संचालन कभी कार्यक्रम की आत्मा माना जाता था, लेकिन आज कई आयोजनों में मंच संचालक स्वयं किसी गुट विशेष का प्रतिनिधि बन जाता है। परिणामस्वरूप समय-वितरण असंतुलित हो जाता है। कुछ कवियों को आवश्यकता से अधिक समय, भूमिका और वाहवाही मिलती है, जबकि कुछ को औपचारिक रूप से दो-तीन मिनट देकर निपटा दिया जाता है। मंच के भीतर की यह राजनीति श्रोता से भले छिपी रहे, लेकिन साहित्य को नुकसान पहुँचाती है।
सम्मान और पुरस्कारों की सच्चाई
कवि सम्मेलनों में दिए जाने वाले अनेक सम्मान और स्मृति-चिह्न भी गुटबाज़ी की भेंट चढ़ चुके हैं। वही नाम बार-बार सम्मानित किए जाते हैं। कई बार यह महसूस होता है कि सम्मान साहित्यिक योगदान का नहीं, बल्कि आयोजकों से संबंधों का पुरस्कार बन गया है। इससे सम्मान की गरिमा और साहित्यिक मूल्यांकन—दोनों कमजोर पड़ते हैं।
सोशल मीडिया और गुटीय प्रचार
सोशल मीडिया ने इस गुटीय संस्कृति को और मज़बूत किया है। अपने गुट के कवियों की प्रस्तुतियों का जमकर प्रचार होता है, जबकि दूसरे गुट की अच्छी प्रस्तुति भी अनदेखी रह जाती है। तारीफ़, साझा करना और समर्थन—सब कुछ सीमित दायरों में सिमट गया है। डिजिटल मंच, जो लोकतांत्रिक होना चाहिए था, कई बार गुटीय प्रचार का औज़ार बन गया है।
साहित्य का मंच या मनोरंजन का मेला?
गुटबाज़ी का सीधा असर कविता की प्रकृति पर भी पड़ा है। गंभीर, विचारोत्तेजक और संवेदनशील रचनाओं की जगह अब त्वरित तालियाँ बटोरने वाली रचनाएँ अधिक पसंद की जाने लगी हैं। कविता धीरे-धीरे साहित्य से खिसककर केवल मंचीय मनोरंजन बनती जा रही है।
क्या हर जगह स्थिति एक-सी है?
यह कहना भी उचित नहीं होगा कि हर कवि सम्मेलन या मुशायरा इसी बीमारी से ग्रस्त है। दिल्ली-एनसीआर में आज भी कुछ आयोजन ऐसे हैं, जो बिना गुट, बिना शर्त और बिना पक्षपात के मंच प्रदान करते हैं। लेकिन ऐसे आयोजन अब अपवाद बनते जा रहे हैं, जबकि गुटबाज़ी सामान्य व्यवहार का रूप लेती जा रही है।
दिल्ली-एनसीआर के कवि सम्मेलन और मुशायरे आज भी जीवंत हैं, सक्रिय हैं और श्रोताओं को आकर्षित करते हैं, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि गुटबाज़ी ने इनके साहित्यिक चरित्र को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।
जब तक आयोजक निष्पक्षता नहीं अपनाते, मंच संचालक ईमानदार नहीं होते और कवि स्वयं गुटों से ऊपर उठकर साहित्य को प्राथमिकता नहीं देते, तब तक यह समस्या बनी रहेगी।
साहित्य का मंच केवल तालियों और पहचान का साधन नहीं, बल्कि समाज का दर्पण और चेतना का वाहक होता है। यदि यह मंच संकीर्णताओं में कैद हो गया, तो नुकसान केवल कवियों का नहीं, बल्कि पूरी साहित्यिक परंपरा का होगा। आज आवश्यकता इस बात की है कि कवि सम्मेलन और मुशायरे फिर से रचना की गरिमा, विचार की स्वतंत्रता और साहित्यिक ईमानदारी की ओर लौटें।
लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)






