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दक्षिण-पूर्व दिशा में रसोई क्यों? — वास्तु के वैज्ञानिक कारण

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कर्नल तेजेन्द्र पाल त्यागी
समस्त ब्रह्मांड पाँच तत्वों से मिलकर बना है। हमारे ऋषि-मुनियों ने सामान्य जन को समझाने के लिए ब्रह्मांड की शक्तियों को “तत्व” के रूप में परिभाषित किया। वास्तव में प्रत्येक तत्व एक ऊर्जा है। उदाहरण के तौर पर जल कोई तत्व नहीं बल्कि H₂O का यौगिक है, फिर भी उसे “जल तत्व” कहा गया। उसी प्रकार पृथ्वी तत्व का आशय चुंबकीय शक्ति से, जल तत्व का गुरुत्वाकर्षण से, अग्नि तत्व का सूर्य किरणों से और आकाश तत्व का कॉस्मिक ऊर्जा से है।

समय, स्थान और परिस्थितियों के साथ हर व्यवस्था बदलती है। जैसे आज पोस्टकार्ड की जगह ई-मेल ने ले ली है, वैसे ही वास्तु के नियमों को भी वर्तमान संदर्भ में समझना चाहिए। इसी संदर्भ में रसोई (आग्नेय कोण) का उदाहरण महत्वपूर्ण है।
प्राचीन ग्रंथों—स्मरांगण सूत्रधार और मायामतम—में रसोई को दक्षिण-पूर्व दिशा में रखने की सलाह दी गई। उस समय न बिजली थी, न रेफ्रिजरेटर और न आधुनिक वेंटिलेशन। इसके पीछे ठोस वैज्ञानिक कारण थे।

पहला कारण प्राकृतिक प्रकाश था। सूर्य का प्रकाश पूर्व से आरंभ होकर दक्षिण की ओर बढ़ता है। दक्षिण-पूर्व दिशा में रसोई रखने से अधिक समय तक प्राकृतिक प्रकाश उपलब्ध रहता था।

दूसरा कारण दक्षिण-पश्चिम मानसून था। केरल तट से टकराकर ये हवाएँ पश्चिमी बन जाती हैं और दक्षिण-पूर्व की खिड़कियों से बाहर निकलते हुए रसोई का धुआँ और दुर्गंध अपने साथ ले जाती थीं। उस समय चिमनी या एग्जॉस्ट फैन नहीं थे।

तीसरा कारण अल्ट्रावायलेट किरणें थीं। दोपहर के समय जब गृहणी रसोई से बाहर रहती थी, तब UV किरणें रसोई में प्रवेश कर जल और खाद्य पदार्थों का प्राकृतिक शुद्धिकरण करती थीं।
इसके अतिरिक्त, सुबह-शाम मिलने वाली इन्फ्रा-रेड किरणें स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होती थीं, जो दक्षिण-पूर्व दिशा में अधिक प्रभावी रूप से प्राप्त होती थीं।

आज के समय में जब एग्जॉस्ट फैन, स्मोक हुड, रेफ्रिजरेटर और कृत्रिम प्रकाश उपलब्ध हैं, तब रसोई का केवल दक्षिण-पूर्व में होना अनिवार्य नहीं रह गया है। यदि रसोई किसी अन्य दिशा में बनी है तो उसे तोड़ने की आवश्यकता नहीं है।

वास्तु शास्त्र भवन की योजना, डिजाइन और निर्माण से जुड़ा विज्ञान है, इसलिए वास्तु विशेषज्ञ का इंजीनियर होना आवश्यक है। आज बिना शास्त्रीय और तकनीकी ज्ञान के अनेक लोग स्वयं को वास्तु विशेषज्ञ बताते हैं, जिससे सावधान रहना चाहिए।

लेखक—कर्नल तेजेन्द्र पाल त्यागी, वीर चक्र
नेशनल चेयरमैन, सोसाइटी ऑफ वास्तु साइंस
बी.एससी., बी.ई. (सिविल), एम.टेक. (स्ट्रक्चर)