यूपी – गाजियाबाद में बढ़ते वायु प्रदूषण को लेकर सिविल सोसाइटी संगठनों ने प्रशासन पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। फ्लैट ओनर फेडरेशन और आरडब्ल्यूए फेडरेशन गाजियाबाद के मुख्यालय, मॉडल टाउन ईस्ट में आयोजित बैठक में चेयरमैन कर्नल तेजेंद्र पाल त्यागी ने कहा कि प्रदूषण से पीड़ित नागरिकों की भरपाई जिलाधिकारी के वेतन से की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि गाजियाबाद एक महीने में कई बार देश का सबसे प्रदूषित शहर घोषित हो चुका है, जिससे आमजन, बच्चे और बुजुर्ग गंभीर रूप से प्रभावित हैं।
कर्नल त्यागी ने कहा कि शहर में लोगों की उम्र कम हो रही है, हर व्यक्ति खांसी और सांस संबंधी बीमारियों से जूझ रहा है, बच्चों के फेफड़े सिकुड़ रहे हैं, लेकिन प्रशासन की ओर से केवल सड़कों पर पानी का छिड़काव कर औपचारिकता निभाई जा रही है। उन्होंने कहा कि यदि पिछले 10 वर्षों से सिविल सोसाइटी द्वारा दिए जा रहे सुझावों को गंभीरता से लिया गया होता, तो आज स्थिति इतनी भयावह न होती।
उन्होंने बताया कि प्रदूषण नियंत्रण अधिकारी ने 24 नवंबर 2025 को वायु प्रदूषण नियंत्रण से जुड़े कुछ सुझाव जिलाधिकारी को भेजे थे, लेकिन लगभग एक महीना बीतने के बावजूद किसी भी बिंदु पर न तो कोई आदेश जारी हुआ और न ही कोई एडवाइजरी। उन्होंने कहा कि जब जनता की जान पर बन आई हो, तब प्रदूषण नियंत्रण को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए, लेकिन शीर्ष अधिकारी अपने कर्तव्यों का निर्वहन नहीं कर रहे हैं।
बैठक में यह भी आरोप लगाया गया कि प्रशासन द्वारा बताए जा रहे वायु प्रदूषण के मानक वास्तविकता से काफी कम हैं। वक्ताओं ने कहा कि भारत में पीएम 2.5 की सुरक्षित सीमा अमेरिका की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक तय की गई है और इसमें वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों को शामिल ही नहीं किया गया है। इससे वास्तविक प्रदूषण स्तर कहीं अधिक खतरनाक हो जाता है।
सिविल सोसाइटी के सदस्यों ने चेतावनी दी कि बच्चों पर वायु प्रदूषण का प्रभाव सबसे अधिक पड़ता है और एक बार फेफड़ों की क्षमता कम हो जाने पर उसका कोई इलाज नहीं है। अंत में कर्नल तेजेंद्र पाल त्यागी, पवन कौशिक, आर के आर्या, जय दीक्षित, कैलाश चंद शर्मा और मुकेश अग्रवाल ने मांग की कि संलग्न सुझावों पर तत्काल कार्रवाई शुरू की जाए और उन्हें लंबे समय के उपाय बताकर टाला न जाए।







