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पाकिस्तान में प्रधानमंत्रियों का इतिहास, वर्तमान स्थिति और माहौल : डॉ. चेतन आनंद

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पाकिस्तान की राजनीति हमेशा से अस्थिरता, सत्ता संघर्ष और सैन्य प्रभाव के लिए जानी जाती रही है। इस पृष्ठभूमि में पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान का उदय और पतन पाकिस्तान की समकालीन राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय बन गया है। उनका कार्यकाल न केवल राजनीतिक घटनाओं से भरा रहा, बल्कि उनके हटने के बाद के हालात ने पूरे देश की लोकतांत्रिक संरचना पर गहरे प्रश्न खड़े कर दिए।

इमरान खान का उदय और परिवर्तन की राजनीति-इमरान खान ने क्रिकेट के मैदान पर विश्व कप जीतकर जो लोकप्रियता हासिल की, उसे उन्होंने राजनीति में परिवर्तन के संदेश के रूप में रूपांतरित किया। 1996 में उन्होंने अपनी पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ की स्थापना की, लेकिन दो दशक तक यह एक छोटी, प्रभावहीन पार्टी बनी रही। 2013 के चुनावों में वे मुख्य विपक्ष बने और 2018 में उन्होंने “नया पाकिस्तान“ के वादे के साथ सत्ता हासिल की। उनका कार्यकाल तीन प्रमुख क्षेत्रों अर्थव्यवस्था, विदेश नीति और सेना से संबंध के इर्द-गिर्द घूमता रहा। आर्थिक मोर्चे पर वे महँगाई, बेरोजगारी और आईएमएफ कर्ज पर निर्भरता को कम नहीं कर सके। विदेश नीति में वे चीन और तुर्की के करीब रहे, जबकि अमेरिका से रिश्ते उतार-चढ़ाव से गुजरे। सेना के साथ उनके शुरुआती मजबूत संबंध बाद में विवाद में बदल गए, खासकर सेना प्रमुख की नियुक्ति को लेकर।

सत्ता से हटने और जेल तक का सफर-अप्रैल 2022 में इमरान खान के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया, जिसे वे बचा नहीं सके। यह पहला मौका था जब पाकिस्तान में किसी प्रधानमंत्री को संसद ने हटाया। इसके बाद उन पर कई कानूनी मामले दर्ज हुए, तोशाखाना, भ्रष्टाचार, साइफर और सरकारी गोपनीय दस्तावेजों से जुड़े मामले प्रमुख हैं। 2023-2025 के दौरान उन्हें कई बार सज़ाएँ सुनाई गईं और वे जेल में ही रहे। उनकी पार्टी पर आधिकारिक प्रतिबंध नहीं लगा, लेकिन उसके दफ्तरों, नेताओं और चुनाव चिह्न तक पर कई तरह के प्रतिबंध और दबाव बनाए गए। चुनावों में भी उनकी पार्टी को कई तकनीकी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, जिससे उनकी राजनीतिक शक्ति काफी सीमित हो गई।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों का इतिहास

पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास को समझने के लिए उसकी प्रधानमंत्री संस्था की स्थिति को देखना आवश्यक है। 1947 में देश की आज़ादी के बाद से आज तक कोई भी प्रधानमंत्री अपनी पाँच वर्ष की अवधि पूरी नहीं कर सका। यह पाकिस्तान की राजनीतिक अस्थिरता का सबसे बड़ा प्रतीक है।

(क) प्रारंभिक दौर (1947-1958)-पहले प्रधानमंत्री लियाक़त अली ख़ान 1951 में हत्या का शिकार हो गए। इसके बाद सत्ता संघर्ष और संविधान की अनिश्चितता ने लगातार सरकारें गिराईं। 1958 में सेना प्रमुख अयूब खान ने मार्शल लॉ लगा दिया।
(ख)सैन्य शासन (1958-1971, 1977-1988, 1999-2008)-अयूब खान, याह्या खान, जिया-उल-हक़ और परवेज मुशर्रफ, इन चार सैन्य शासनों ने कुल मिलाकर 30 से अधिक वर्षों तक पाकिस्तान पर शासन किया। इन कालखंडों में लोकतंत्र कमजोर हुआ और नागरिक सरकारों को केवल नाममात्र की शक्ति मिलती रही।
(ग) लोकतांत्रिक प्रयोग और अस्थिरता (1988-2018)-इस दौर में कई महत्वपूर्ण प्रधानमंत्री आए, बेनज़ीर भुट्टो पहली मुस्लिम महिला च्ड, दो बार हटाई गईं। नवाज़ शरीफ़, तीन बार पीएम बने, तीनों बार असमय हटे, कभी सेना से विवाद, कभी न्यायपालिका से। यूसुफ़ रज़ा गिलानी, न्यायालय ने हटाया। शाहिद खाक़ान अब्बासी, शौकत अज़ीज़, जफ़रुल्लाह जमाली जैसे नेता भी लंबी अवधि तक नहीं टिक सके। इमरान खान (2018-2022) उनका हटना भी अस्थिरता की इसी पुरानी परंपरा का एक और अध्याय बन गया। यह इतिहास दिखाता है कि पाकिस्तान में सत्ता का वास्तविक केंद्र हमेशा नागरिक सरकार नहीं बल्कि सेना, नौकरशाही और न्यायपालिका की संयुक्त संरचना रहा है।

पाकिस्तान का वर्तमान राजनीतिक माहौल (2024-2025)

(क)राजनीतिक परिदृश्य-2024-25 में पाकिस्तान में गठबंधन सरकार है, जिसे सेना का समर्थन प्राप्त माना जाता है। विपक्ष विभाजित और कमजोर स्थिति में है। सोशल मीडिया पर सेंसरशिप बढ़ी है और पत्रकारों व विपक्षी नेताओं पर कार्रवाई तेज हुई है। संसद और न्यायपालिका में भी सत्ता संतुलन का संघर्ष देखा जा रहा है।
(ख)इमरान खान की भूमिका-हालाँकि वे जेल में हैं, पर उनके समर्थकों में नाराज़गी और उनके लिए सहानुभूति उच्च स्तर पर है। उनकी रिहाई या चुनावी वापसी की संभावनाएँ अभी अनिश्चित हैं, लेकिन पाकिस्तान की राजनीति में उनकी छाया अब भी मौजूद है।

आर्थिक स्थितिः संकट गहरा, समाधान अनिश्चित-पाकिस्तान 2024-25 में गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहा है। विदेशी मुद्रा भंडार लगातार घटता रहा। महँगाई 20-28 प्रतिशत के आस-पास रही। आईएमएफ कार्यक्रमों ने कठोर आर्थिक शर्तें लगाईं, बिजली दरें बढ़ीं, टैक्स बढ़ाए गए। उद्योग, शिक्षा और स्वास्थ्य बजट पर भारी दबाव पड़ा। जनता महँगाई से त्रस्त है और बेरोज़गारी उच्च स्तर पर है। चीन, सऊदी अरब और यूएई से आर्थिक मदद मिलती रही है, लेकिन यह दीर्घकालीन समाधान नहीं माना जाता।

सुरक्षा और सामाजिक माहौल-पाकिस्तान के कई क्षेत्रों विशेषकर खैबर पख्तूनख्वा, बलूचिस्तान और अफगान सीमा से लगे इलाकों में आतंकी घटनाएँ बढ़ी हैं। टीटीपी की सक्रियता ने सरकार और सेना की चुनौतियाँ बढ़ा दी हैं। सामाजिक तौर पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित, मीडिया पर दबाव, राजनीतिक आवाज़ों पर कार्रवाई, विपक्ष पर अंकुश, ये स्थितियाँ आम हैं। जनता में भविष्य को लेकर अनिश्चितता का भाव गहरा है।
बड़ी चुनौतियाँ और संभावनाएँ

पाकिस्तान के सामने आने वाले वर्षों में तीन प्रमुख चुनौतियाँ हैं-

(1)राजनीतिक स्थिरता-जब तक नागरिक सरकार, न्यायपालिका और सेना के बीच संतुलन नहीं बनता, लोकतंत्र मजबूत नहीं होगा। इमरान खान की जेल से रिहाई या राजनीतिक वापसी भी परिदृश्य बदल सकती है।
(2) आर्थिक मजबूती-अंतरराष्ट्रीय कर्ज, महँगाई और ऊर्जा संकट से बाहर निकलना सबसे कठिन कार्य होगा। चीन और गल्फ देशों की भूमिका अहम बनी रहेगी।
(3) सुरक्षा और सामरिक वातावरण-टीटीपी, बलूच विद्रोह और अफगानिस्तान की स्थिति पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा को प्रभावित करती रहेगी। इमरान खान की गिरफ्तारी, अस्थिर सरकार और आर्थिक संकट ये तीन कारक आज पाकिस्तान की राजनीति को परिभाषित कर रहे हैं। पाकिस्तान का राजनीतिक इतिहास यही बताता है कि वहाँ लोकतंत्र कभी भी सीधी रेखा में नहीं चला। वर्तमान माहौल भी उसी अस्थिरता और संघर्ष की निरंतरता है। फिर भी, पाकिस्तान की राजनीति में इमरान खान, सेना का प्रभाव, आर्थिक मददगार देशों का दबदबा और जनता की उम्मीद ये सब मिलकर आने वाले समय का नया अध्याय लिखेंगे।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)