Screenshot_20221103-203604_YouTube
IMG-20230215-WA0382
a12
IMG-20230329-WA0101
Screenshot_20251019_113536_OneDrive
screenshot_20260125_230217_gallery4476655999519321620.jpg
PlayPause
previous arrow
next arrow

किसी से कम नहीं हैं भारत की छोरियाँ: विज्ञान से विश्वकप तक चमकी नारीशक्ति

Share on facebook
Share on whatsapp
Share on twitter
Share on google
Share on linkedin

लेखक: डॉ. चेतन आनंद (कवि–पत्रकार)


भारत की बेटियाँ आज हर क्षेत्र में अपनी पहचान बना रही हैं। विज्ञान की प्रयोगशालाओं से लेकर खेल के मैदानों तक, उद्यमिता से लेकर कूटनीति और साहित्य तक—हर मंच पर भारतीय नारी ने अपने साहस, प्रतिभा और परिश्रम से देश का गौरव बढ़ाया है। सन् 2015 से 2025 का यह दशक नारीशक्ति के उत्कर्ष का स्वर्णिम काल कहा जा सकता है।


विज्ञान और अंतरिक्ष में भारतीय नारी का परचम

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) में अब महिलाएँ केवल सहायक नहीं, बल्कि नेतृत्वकर्ता बन चुकी हैं। डॉ. ऋतु करिधल श्रीवास्तव और वनीता रंगनाथन जैसी वैज्ञानिकों ने चन्द्रयान-2 और चन्द्रयान-3 अभियानों में प्रमुख भूमिका निभाई।
2023 में जब भारत ने चन्द्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर इतिहास रचा, तब इसमें महिलाओं की निर्णायक भूमिका रही।
“भारत की मिसाइल वुमन” टेस्सी थॉमस ने रक्षा अनुसंधान के क्षेत्र में अग्रणी योगदान दिया, जबकि डॉ. सौम्या स्वामीनाथन विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की मुख्य वैज्ञानिक बनीं—जो भारत के लिए गर्व की बात है।


उद्यमिता में आत्मनिर्भरता की मिसाल

आर्थिक क्षेत्र में भी भारत की बेटियाँ किसी से कम नहीं हैं। फाल्गुनी नायर की नायका, विनीता सिंह की शुगर कॉस्मेटिक्स और गज़ल अलग की मामाअर्थ जैसी कंपनियों ने भारतीय महिलाओं को उद्योग जगत की निर्णायक शक्ति बना दिया है।
आज देश के लगभग 20% नए स्टार्टअप्स महिलाएँ चला रही हैं, जिनमें से 40% उद्यमी अकेले ही अपने व्यवसाय का संचालन करती हैं। यह आँकड़े भारत की आर्थिक आत्मनिर्भरता में नारीशक्ति की बढ़ती भूमिका का प्रमाण हैं।


साहित्य और कला में वैश्विक पहचान

भारतीय महिला लेखिकाएँ अब विश्व साहित्य में अपने शब्दों से पहचान बना रही हैं।
2025 में बानु मुश्ताक और दीपा भस्थी को कन्नड़ कहानियों के लिए अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार मिला—जो भारतीय भाषाओं की वैश्विक स्वीकृति का प्रतीक है।
कवयित्री अरुंधति सुब्रमण्यम की कविताएँ और निर्देशिकाएँ जोया अख़्तर, रीमा कागती, गायत्री पुष्पक के सिनेमा कार्य भी भारत की रचनात्मक महिलाओं की नई ऊँचाइयाँ दिखाते हैं।


खेलों में स्वर्णिम दशक

भारतीय महिला खिलाड़ियों ने विश्व खेल मंचों पर तिरंगा फहराया है—

पी. वी. सिंधु (2016) – रियो ओलंपिक रजत

मीराबाई चानू (2021) – भारोत्तोलन रजत

निकहत ज़रीन (2022) – विश्व मुक्केबाज़ी स्वर्ण

स्मृति मंधाना (2024) – विश्व रिकॉर्ड 763 रन

भारतीय महिला क्रिकेट टीम (2025) – पहला विश्वकप विजेता

दिव्या देशमुख – विश्व महिला शतरंज कप विजेता

हरमनप्रीत कौर और स्मृति मंधाना जैसी खिलाड़ी आज नई पीढ़ी की प्रेरणा बन चुकी हैं।


नीति और समाज सेवा में नेतृत्व

भारत की महिलाएँ अब शासन, नीति-निर्माण और समाज सेवा के क्षेत्र में भी अग्रणी हैं।
नीना गुप्ता, संयुक्त राष्ट्र महिला शाखा की प्रतिनिधि, को 2025 में लैंगिक समानता अभियान में योगदान के लिए अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिला।
नीति आयोग के अनुसार, वरिष्ठ प्रशासनिक सेवाओं में महिलाओं की संख्या पिछले दशक में 90% तक बढ़ी है। यह परिवर्तन भारत के सामाजिक ढांचे में नारी दृष्टिकोण की सशक्त उपस्थिति का संकेत है।


दशकीय उपलब्धियों की झलक

वर्ष क्षेत्र प्रमुख नाम उपलब्धि

2015 विज्ञान टेस्सी थॉमस क्षेपणास्त्र प्रौद्योगिकी में नेतृत्व
2016 खेल पी. वी. सिंधु ओलंपिक रजत पदक
2018 उद्यम फाल्गुनी नायर ‘नायका’ को यूनिकॉर्न दर्जा
2019 शतरंज कोनेरु हुम्पी विश्व रैपिड विजेता
2020 स्वास्थ्य डॉ. सौम्या स्वामीनाथन WHO की प्रमुख वैज्ञानिक
2021 खेल मीराबाई चानू ओलंपिक रजत पदक
2022 मुक्केबाज़ी निकहत ज़रीन विश्व विजेता
2023 अंतरिक्ष ऋतु करिधल ‘चन्द्रयान-3’ में प्रमुख भूमिका
2024 क्रिकेट स्मृति मंधाना सर्वाधिक रन, विश्व रिकॉर्ड
2025 साहित्य बानु मुश्ताक अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार


चुनौतियाँ और दिशा

हालाँकि उपलब्धियाँ प्रेरणादायक हैं, पर चुनौतियाँ अभी बाकी हैं।
विज्ञान व तकनीकी में महिलाओं की भागीदारी केवल 33% है, और नेतृत्व स्तर पर यह संख्या आधी भी नहीं।
ग्रामीण प्रतिभाओं को राष्ट्रीय मंच तक लाने के लिए शिक्षा, प्रशिक्षण और डिजिटल सुविधाओं की आवश्यकता है।
सरकारी योजनाएँ जैसे बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, स्टार्टअप इंडिया बीज निधि योजना और विज्ञान में महिलाएँ कार्यक्रम इन बाधाओं को दूर करने का प्रयास कर रही हैं।


निष्कर्ष

सन् 2015 से 2025 का दशक भारतीय नारीशक्ति के आत्मविश्वास और कर्मठता की जीवंत गाथा है।
आज “किसी से कम नहीं हैं भारत की छोरियाँ” केवल नारा नहीं, बल्कि यथार्थ है।
विज्ञान में तारे खोजने से लेकर साहित्य में संवेदनाएँ लिखने तक, उद्योग में नई अर्थनीति गढ़ने से लेकर खेलों में विश्व विजेता बनने तक—भारत की बेटियाँ भविष्य लिख रही हैं।