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दिल्ली-एनसीआर की हाउसिंग सोसायटियों में बढ़ते विवाद कारण, उदाहरण, निवारण और सरकारी प्रयास

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डॉ. चेतन आनंद

भारत की राजधानी दिल्ली और उससे सटे एनसीआर (नोएडा, गुरुग्राम, फरीदाबाद, गाजियाबाद) क्षेत्र आज देश के सबसे विकसित शहरी इलाकों में गिने जाते हैं। यहाँ लाखों लोग बहुमंज़िला हाउसिंग सोसायटियों में रहते हैं। ये सोसायटियाँ आधुनिक जीवनशैली का प्रतीक तो बन गई हैं, लेकिन इनके भीतर उठते विवाद अब एक गंभीर सामाजिक व प्रशासनिक समस्या का रूप ले चुके हैं। आमतौर पर इन सोसायटियों में “साझा जीवन, सुविधाएँ और सुरक्षा” का सपना देखा जाता है, लेकिन व्यवहार में आए दिन मेंटेनेंस फीस, पार्किंग, पानी-बिजली, समिति चुनाव, भ्रष्टाचार और सदस्य-असहमति जैसे विवाद सुर्खियाँ बनते रहते हैं।

विवादों के प्रमुख कारण
1.मेंटेनेंस और शुल्क विवाद-दिल्ली और गुरुग्राम की कई सोसायटियों में मेंटेनेंस चार्ज को लेकर विवाद आम हैं। उदाहरण के तौर पर नोएडा सेक्टर 137 की पाम ओलंपिया सोसायटी में निवासियों ने समिति के खिलाफ धरना दिया क्योंकि मेंटेनेंस चार्ज हर वर्ष बिना स्पष्ट लेखे बढ़ा दिया गया था। कई परिवारों का आरोप था कि उन्हें सुरक्षा और सफाई जैसी बुनियादी सुविधाएँ भी पूरी नहीं मिल रहीं। इसी तरह, गुरुग्राम की निर्वाणा कंट्री सोसायटी में बिजली बैकअप और मेंटेनेंस चार्ज को लेकर निवासी और प्रबंधन में टकराव इतना बढ़ा कि मामला अदालत तक पहुँचा। गोविन्दपुरम गाजियाबाद की गौड़ होम्स सोसायटी में चुनाव, रखरखाव और गबन का मुद्दा गर्माया हुआ है। आरोप है कि प्रशासन द्वारा चुनाव कराने के बाद भी पूर्व पदाधिकारी अपने पद छोड़ने के बजाय कोर्ट कचहरी के चक्कर काट रहे हैं। इससे सोसायटी का आम जनमानस तो परेशान है ही नई कार्यकारिणी सदस्य भी आर्थिक अभाव में अपने कर्तव्यों को सही से अंजाम नहीं दे पा रहे।
2.प्रबंधन समितियों की पारदर्शिता की कमी-अक्सर सोसायटी के मैनेजिंग कमेटी पर भ्रष्टाचार, फर्जी बिलिंग और ठेकेदारों से सांठगांठ के आरोप लगते हैं। दिल्ली वसंत कुंज की ए-2 ब्लॉक कोऑपरेटिव सोसायटी में सदस्यों ने शिकायत की कि प्रबंधन समिति ने लाखों रुपये के पेंटिंग और लिफ्ट रिपेयर के बिल बिना जनरल बॉडी की मंजूरी के पास कर दिए। इन मामलों में चुनाव समय पर न होना, लेखा पुस्तकों का न दिखाया जाना और सदस्यों को वोट का अधिकार न मिलना, विवाद को जन्म देता है।
3.अवैध निर्माण और नियमों का उल्लंघन-एनसीआर की कई सोसायटियों में सदस्य अपने फ्लैटों में अवैध विस्तार, बालकनी बंद करना या टेरेस पर कमरे बनाना शुरू कर देते हैं, जिससे न केवल सौंदर्य बिगड़ता है बल्कि सुरक्षा पर भी असर पड़ता है। गाजियाबाद की इंदिरापुरम की एक सोसायटी में ऐसे ही एक मामले में लिफ्ट शाफ्ट में अवैध निर्माण से संरचना कमजोर हो गई थी और स्थानीय विकास प्राधिकरण को हस्तक्षेप करना पड़ा।
4.सदस्यों के आपसी विवाद और अनुशासनहीनता-कई बार विवाद समिति से नहीं, बल्कि निवासियों के आपसी टकराव से शुरू होते हैं। जैसे पार्किंग स्लॉट, पालतू जानवरों का व्यवहार, रात का शोर या सामुदायिक स्थानों के उपयोग पर असहमति। नोएडा सेक्टर 75 की एक सोसायटी में पालतू कुत्ते को लेकर दो परिवारों में झगड़ा इतना बढ़ा कि मामला पुलिस थाने तक पहुँचा। इस प्रकार के छोटे विवादों की बढ़ती घटनाएँ “साझा समुदाय” की भावना को कमजोर कर रही हैं।
5.भ्रष्टाचार और सरकारी निगरानी की कमी-दिल्ली की कई पुरानी हाउसिंग सोसायटियाँ जैसे द्वारका सेक्टर-6 और 11 की कोऑपरेटिव ग्रुप हाउसिंग सोसायटियाँ में सदस्यों ने शिकायत की कि समिति और रजिस्ट्रार ऑफिस के बीच मिलीभगत से फर्जी ऑडिट रिपोर्टें बनाई गईं। कई बार शिकायतें वर्षों तक लंबित रहती हैं, जिससे निवासियों में सरकार के प्रति अविश्वास बढ़ता है।

विवाद निवारण के उपाय
विवादों को रोकने और हल करने के लिए सोसायटी स्तर पर कुछ ठोस कदम उठाए जा सकते हैं-
1.स्पष्ट नियमावली और पारदर्शिता-हर सोसायटी को अपने बायलॉज को समय-समय पर अपडेट करना चाहिए। नियमों की प्रति हर सदस्य को दी जानी चाहिए। यदि शुल्क, पार्किंग, मेंटेनेंस के नियम पहले से लिखित रूप में हों तो विवाद की संभावना घट जाती है।
2.लेखा-जांच और जवाबदेही-समिति को सालाना ऑडिट कराना चाहिए और खर्च का लेखा सभी सदस्यों के लिए पारदर्शी बनाना चाहिए। दिल्ली में कई सोसायटियों ने अब “ऑनलाइन अकाउंटिंग सिस्टम” शुरू किया है ताकि कोई अनियमितता छिप न सके।
3.नियमित चुनाव और सामूहिक निर्णय-जनरल बॉडी मीटिंग्स (जीबीएम) नियमित अंतराल पर आयोजित होनी चाहिए। प्रत्येक बड़े निर्णय जैसे ठेके देना, शुल्क बढ़ाना या मेंटेनेंस कंपनी बदलना सदस्यों की आम सहमति से होना चाहिए।
4.मध्यस्थता और संवाद-छोटे विवादों को अदालत में ले जाने की बजाय सोसायटी के भीतर या किसी निष्पक्ष मध्यस्थ के जरिए सुलझाया जा सकता है। दिल्ली डिस्प्यूट रेजॉल्यूशन सोसाइटी इस तरह की मध्यस्थता को प्रोत्साहन देती है। यहाँ ट्रेंड मध्यस्थों के माध्यम से बिना खर्च विवाद सुलझाए जा सकते हैं।
5.सदस्यों की शिक्षा और जिम्मेदारी-सदस्यों को अपने अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों का भी बोध होना चाहिए। अक्सर किरायेदारों और नए निवासियों को नियमों की जानकारी नहीं होती, जिससे विवाद बढ़ते हैं। कुछ सोसायटियों ने अब “सोसायटी इंडक्शन मीटिंग” शुरू की है ताकि नए सदस्य सभी नियमों को समझ लें।

सरकारी प्रयास और विधिक प्रावधान
1.दिल्ली में कोऑपरेटिव ग्रुप हाउसिंग सोसायटियों को संचालित करने के लिए यह दिल्ली कॉपरेटिव सोसायटीज एक्ट 2003 और रूल्स 2007 कानून लागू है। इसमें सोसायटी के गठन, चुनाव, वित्तीय अनुशासन और विवाद निवारण की विस्तृत प्रक्रिया दी गई है। इस अधिनियम के तहत रजिस्ट्रार ऑफ कॉपरेटिव सोसायटीज यानी आरसीएस सोसायटियों की निगरानी करता है।
2.दिल्ली सरकार ने आरसीएस की वेबसाइट पर ऑनलाइन शिकायत प्रणाली शुरू की है, जिससे सदस्य अपने विवाद दर्ज कर सकते हैं। उदाहरण के तौर पर, 2024 में दिल्ली सरकार ने आरसीएस पॉर्टल लॉन्च किया, जिसमें सोसायटियों से जुड़ी फाइलें, ऑडिट रिपोर्ट और शिकायतें ऑनलाइन ट्रैक की जा सकती हैं।
3.दिल्ली डिस्प्युट रिसोलेशन सोसायटी यानी डीडीआरएस “विवाद सुलझाओ, अदालत मत जाओ” की भावना के तहत कार्य करती है। यहाँ हाउसिंग सोसायटी विवाद, पारिवारिक विवाद, मकान-मालिक और किरायेदार विवाद मध्यस्थता द्वारा हल किए जाते हैं। इस संस्था ने 2024 तक लगभग 35,000 से अधिक मामलों में सफल समाधान किया है।
4.नोएडा और ग्रेटर नोएडा में नॉएडा अथॉरिटी और जीएनआईडीए, जबकि गुरुग्राम में डिपार्टमेंट ऑफ टाउन एंड कंट्री प्लानिंग सोसायटियों के निर्माण और रखरखाव की निगरानी करते हैं। इन प्राधिकरणों ने “रेसिडेंट ग्रिवांस पोर्टल” शुरू किए हैं जहाँ निवासी शिकायतें दर्ज कर सकते हैं।
5.यदि सोसायटी विवाद आंतरिक रूप से नहीं सुलझता, तो दिल्ली कॉ-ऑॅपरेटिव ट्रिब्यूनल या कंज्यूमर कोर्ट में मामला ले जाया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर 2023 में नोएडा की एमरल्ड कोर्ट सोसायटी के निवासियों ने बिल्डर के खिलाफ उपभोक्ता फोरम में केस जीता और मेंटेनेंस चार्ज में राहत पाई।

भविष्य की दिशा : सुधार की राह
हाउसिंग सोसायटियों को “साझा समाज” के रूप में विकसित करने के लिए प्रशासनिक सुधार और नागरिक सहयोग, दोनों आवश्यक हैं।
कुछ सुझाव निम्नलिखित हैं-
ई-गर्वनेंस प्रणाली-सभी सोसायटियों में डिजिटल वोटिंग, ऑनलाइन ऑडिट और शिकायत ट्रैकिंग सिस्टम लागू किया जाए।
सोसायटी ओम्बड्समैन की नियुक्ति-हर जिले में एक स्वतंत्र अधिकारी नियुक्त किया जाए जो सोसायटी मामलों की त्वरित सुनवाई करे।
समिति प्रशिक्षण कार्यक्रम-प्रबंधन समिति के सदस्यों को प्रशिक्षण दिया जाए कि वे कानून, वित्त और संवाद-कौशल में दक्ष बनें।
निवासी भागीदारी को बढ़ावा-प्रत्येक निर्णय में पारदर्शी जनमत या ऑनलाइन सर्वे के माध्यम से सदस्य की भागीदारी सुनिश्चित हो।
राज्य स्तरीय निरीक्षण अभियान-समय-समय पर सरकार द्वारा सोसायटियों के ऑडिट और निरीक्षण किए जाएँ ताकि भ्रष्टाचार पर रोक लगे।
दिल्ली-एनसीआर की हाउसिंग सोसायटियाँ आधुनिक भारत की शहरी जीवनशैली का आईना हैं, जहाँ विविध समुदाय एक साथ रहते हैं। लेकिन जब पारदर्शिता, संवाद और ईमानदारी कमजोर पड़ जाती है, तो यही सहजीवन विवाद का केंद्र बन जाता है। जरूरत है कि सरकार, सोसायटी प्रबंधन और निवासी तीनों मिलकर साझा जिम्मेदारी निभाएँ। जहाँ नियमों का पालन, पारदर्शिता और संवाद की संस्कृति मजबूत होगी, वहीं ये सोसायटियाँ वास्तव में “नए भारत की शहरी सभ्यता” की मिसाल बन सकेंगी।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)